शुभजिता पड़ताल : मंडपों में जब खोजने निकले उत्सव की आत्मा

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शुभजिता फीचर डेस्क

दुर्गा पूजा बीत चुकी है और दिवाली आ रही है। त्योहार कोई भी हो, उसके केन्द्र में स्त्री रहती है। नवरात्रि के केन्द्र में माँ दुर्गा हैं। बंगाल में तो दुर्गा को बेटी मानकर ही आराधना की जाती है और बेटियों को माँ ही कहा जाता है मगर पीछे मुड़कर आज पूजा का स्वरूप देखती हूँ तो अन्तर दिखता है। अगर आज से 8 -10 साल पहले की बात की जाये तो जाए तो शायद इतनी भव्यता नहीं थी मगर उत्सव की आत्मा अवश्य थी। तब उत्सव में आडम्बर नहीं था मगर उत्साह था। हर साल की तरह इस बार भी पूजा देखने गयी। कुछ पूजा मंडपों की परिक्रमा का विवरण भी दिया मगर शुभजिता की विशेषता यही है कि वह भीड़ में से कुछ अलग खोजती है। करोड़ों के मंडप और हजार टन की प्रतिमाओं के बीच सादगी में जो बात होती है, वह इतनी महत्वपूर्ण है कि उसे बचाये रखना बहुत आवश्यक है। हमारी परिक्रमा का मापदण्ड यह कभी नहीं रहा कि किस पूजा कमेटी के सिर पर किस बड़े नेता का हाथ है या उसने किस प्रतिमा पर कितना अधिक खर्च किया है। महत्वपूर्ण यह है कि उसमें ऐसा क्या है जो हमें अपनी जड़ों चक ले जाता है और सबसे बड़ी बात वह मंडप संदेश क्या दे रहा है।
तो अपनी इस परिक्रमा के पड़ताल में अपने साधनों की सीमा के बीच हमने जो ऐसे मंडप देखे…आज उन पर आपसे बात करेंगे। हम यहाँ यह अवश्य कहना चाहेंगे कि हम जो देख पाए…वह हमारे साधनों की सीमा थी, इसका तात्पर्य यह कतई नहीं है कि दूसरे अन्य मंडप सुन्दर नहीं थे…हम उनकी बात कर रहे हैं जिनको हम देख पाये।
बात दुर्गा पूजा की हो बंगाल के हर मंडप में काम में जुटा कारीगर और कलाकार अपनी पूरी श्रद्धा से काम करता है इसलिए हर एक पूजा मंडप अपने -आप में सुन्दर है मगर जीवन के रंग से सजे मंडप जब सामने आते हैं तो एक वास्तविक अनुभूति होती है, एक सुकून मिलता है, बस हमारे चयन का आधार यही है और यह भी सीमित संसाधन और बजट के रहते हुए भी आप क्या संदेश और सृजनात्मकता ला सकते हैं। भव्यता और बजट हमारे चयन का आधार नहीं था इसलिए बड़े पूजा मंडप इस सूची में आपको नहीं मिलेंगे। इसका अर्थ यह नहीं कि वे सुन्दर नहीं मगर मौलिकता और उत्सव का सुकून…जो बच्चों के चेहरे पर भी मुस्कान ला दे…आपको अपनी जड़ों से मिला दे.वह अवश्य विशेष होता है। हमारे साथ आप भी चलिए देखते हैं –


47 पल्ली युवक वृन्द
इस पूजा मंडप में जाते ही श्यामल सुन्दर धरती की परिकल्पना साकार हो उठी। पूरा मंडप मिट्टी के कुल्हड़ों, बाँस की टोकरियों से सजाया गया था। इस पूजा की थीम थी सृष्टि और माँ की प्रतिमा इतनी मनोहर और भव्य रही कि उशे देखना ही एक अलग अनुभव दे गया।


मध्य कोलकाता सार्वजनीन
यह मंडप अक्सर बच्चों को ध्यान में रखकर बनाया जाता है। यहाँ प्रवेश द्वार पर खड़े गणेश जी आपके चेहरे पर मुस्कान ले आए। अन्दर जाने पर विक्रम – बेताल की जोड़ी के साथ रामकृष्ण परमहंस और मां शारदा दिखे। साथ ही साक्षरता का संदेश देते जानवर भी दिए। प्रतिमा परम्परागत थी और जरी साज इसे सुन्दर बना रहे थे।


संतोष मित्रा स्क्वायर
दिल्ली का लाल किला की प्रतिकृति बना यह मंडप खूब प्रशंसा पा गया। प्रतिमा पारम्परिक मगर आजादी के महोत्सव की थीम से सजा यह मंडप निश्चित रूप से एक प्रेरणा देने वाला था।


कॉलेज स्क्वायर
जब आप वृन्दावन के प्रेम मंदिर को तिरंगे की रोशनी से नहाया देखते हैं तो एक अद्भुत अनुभूति होती है। मंडप को विष्णुवतार की लीलाओं और राधा – कृष्ण की झांकियों से सजाया गया है। तरणताल के निकट बने इस मंडप को इसकी प्रकाश सज्जा के लिए विशेष रूप से जाना जाता है।


जोड़ासांको 73 पल्ली सार्वजनीन दुर्गा पूजा
आधुनिक जीवन की कंक्रीट की इमारतों में फंसा शहरी मानव थोड़ी शांति चाहता है। किसी आधुनिक आवासीय परिसर की प्रतिकृति इस मंडप के बाहर बना पिंजरा कहीं न कहीं पराधीनता की गाथा कह रहा था और पक्षियों की चहचटाहट अपनी आवाज मुखर रही थी। मंडप को चिड़ियों से ही सजाया गया था।
श्री बांसतल्ला सार्वजनीन दुर्गोत्सव समिति
मंडप लेटर बॉक्स से सजाया गया था और वंदे मातरम् के चित्रण ने इसे और सुन्दर बना दिया। देवी के पीछे तिरंगे की पृष्ठभूमि और शहीदों की तस्वीरों ने देशभक्ति की भावना तरंगित कर दी। यहाँ माँ को भगवा वस्त्रों में दिखाया गया जो कि वंदे मातरम् की थीम के अनुरूप ही था।


गंगाधर बाबू लेन का एथलेटिक क्लब
मंडप की थीम शांति थी। पंडाल के सामने गौतम बुद्ध मुस्कुरा रहे थे और माँ के हाथों में त्रिशूल था और शेष सभी हाथों में कमल सजा था। प्रतिमा छोटी और संदेश बड़ा था।
इसके अतिरिक्त मढुआ, प्रेमचंद बड़ाल स्ट्रीट जैसी जगहों पर भी आकर्षक मंडप देखने को मिले। ऐसे ही दिखा शतदल संघ दुर्गोत्सव का पंडाल जिसे रंग – बिरंगी छतरियों से सजाया गया था।

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