शुभजिता वाणी प्रवाह वसंतोत्सव – हे नेताजी! लोहो प्रणाम

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शुभांगी उपाध्याय

मुर्दों में भी जान फूंक दें, ऐसी ओजस्वी वाणी थी।
फिरंगियों की ऐसी की तैसी, करने की मन में ठानी थी।

जो इंकलाब की अलख जगाने, भारतवर्ष में जन्में थे,
थर्रा उठते थे शत्रु जिनसे, वह शस्त्रधारी सन्यासी थे।

थे आजादी के मतवाले, भारत माता के रखवाले।
आज़ाद हिन्द के निर्माता, बेजोड़ धरा पर इनकी गाथा।

हैं हिंद धरा के स्वाभिमान, हे नेताजी! लोहो प्रणाम ।।

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