संग्रामी सावरकर : तीनों भाई जेल गए तो महिलाओं ने सम्भाला परिवार

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वीर सावरकर पर हमला हुआ तो लाठी लेकर खड़ी हुईं पत्नी

वीर सावरकर हमेशा से ही चर्चा में रहे हैं और उनके विरोधी विवाद खड़ा करते रहे हैं। आज हम बात वीर सावरकर भाइयों की करेंगे मगर विवाद की नहीं, बल्कि सावरकर परिवार की उन महिलाओं की जो उनकी प्रेरणा बनीं और स्वाधीनता संग्राम में उनकी ढाल भी बनीं।

savarkar.org के मुताबिक वीर सावरकर जब अंडमान की सेलुलर जेल में थे, तब उनकी पत्नी यमुनाबाई ने पूरे परिवार की जिम्मेदारी संभाली। यमुनाबाई का साहस तब देखने को मिला, जब महात्मा गांधी की हत्या के बाद भीड़ ने सावरकर को मारने के लिए उनके घर को घेर लिया। यमुनाबाई खुद लाठी लेकर भीड़ के सामने खड़ी हो गयीं। सावरकर गांधी की हत्या में आरोपी थे जिन्हें बाद में आरोप मुक्त कर दिया गया।

सावरकर महिलाओं की जिंदगी पर उपन्यास
सावरकर की जिंदगी पर छिड़ी बहस के बीच डॉ. शुभा साठे का उपन्यास ‘त्या तिघी’ चर्चा में आ गया है। इसमें उन्होंने सावरकर परिवार की तीन महिलाओं का जिक्र किया है। त्या तिघी उपन्यास के आधार पर नाटक तैयार करने वाली अपर्णा चोथे का कहना है कि यह उपन्यास स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के परिवार की महिलाओं पर आधारित है।

यमुनाबाई

सावरकर परिवार की महिलाओं की चर्चा नहीं होती
सावरकर भाइयों यानी गणेश, विनायक और नारायण सावरकर की स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका की अब तक चर्चा होती रही है, लेकिन तीनों भाइयों की पत्नियों- यशोदाबाई, यमुनाबाई और शांताबाई सावरकर के बलिदान और संघर्ष को लेकर चर्चा देखने को नहीं मिलती है।

नाटक के जरिए उजागर की महिलाओं की भूमिका
अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में अपर्णा चोथे ने कहा, ‘मुझे डॉ. शुभा साठे के उपन्यास ‘त्या तिघी’ के बारे में पता चला। इसमें तीनों सावरकर महिलाओं के संघर्ष और बलिदान की कहानी है। यह महत्वपूर्ण लग रहा था कि उनकी कहानी को बताया जाए। इसी इरादे से मैंने तीन सावरकर महिलाओं पर आधारित एक नाटक के मंचन का फैसला किया।’

पति को आजादी की लड़ाई में हर सहयोग दिया
अपर्णा कहती हैं, ‘कई लोगों के जीवन में संकट उनके भाग्य में होता है, लेकिन जो इन तीन महिलाओं को अलग बनाता है, वह है उनका जीवन जीने का तरीका। वो दुख, शोक, संकट और पीड़ा का जहर पीते हुए भी सोच में जीवंत थीं। उनकी देशभक्ति सच्ची थी। इन तीनों महिलाओं ने अपने पतियों से अलग होने की पीड़ा और भूख को सहने के बावजूद, स्वतंत्रता के लिए अपने पतियों के संघर्षों में साथ दिया। वे जानती थीं कि उनके पतियों ने देश की सेवा करने की शपथ ली है, इसलिए उन्होंने परिवार को संभाला, एक-दूसरे का साथ दिया। इस तरह आजादी की लड़ाई में अपनी भूमिका निभाई।’

सावरकर महिलाओं की कहानी कहता है त्या तिघी
अपर्णा बताती हैं, ‘त्या तिघी’ 80 मिनट का एक नाटक है। इसे मैंने तीन बहनों की भूमिका, उनके जीवन के उदाहरणों के आधार पर तैयार किया है। सबसे बड़े कपल यशोदाबाई और गणेश सावरकर ने खुद अशिक्षित होने के बावजूद अनाथ छोटे भाइयों की परवरिश की। उन्होंने विनायक को बैरिस्टर और नारायणराव को डॉक्टर बनने में मदद की। जब गणेश और विनायक सावरकर अंडमान की सेलुलर जेल में लाइफटाइम जेल की सजा काट रहे थे, तब उनकी पत्नियों को उनके घर पर लगातार पुलिस छापे के साथ रोजमर्रा की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। यहां तक कि शांताबाई भी सबसे छोटे भाई नारायणराव से शादी करने के लिए तब भी तैयार हो गईं, जब उन्हें पता चला कि दोनों बड़े भाइयों को उनकी राष्ट्रवादी गतिविधियों के लिए जेल में डाल दिया गया है। इन महिलाओं का उनके रिश्तेदारों ने भी साथ नहीं दिया। फिर भी वे डटी रहीं।
कैसे हुई यमुनाबाई और सावरकर की शादी?
यमुनाबाई का जन्म 04 दिसंबर 1888 को हुआ था। वह रामचंद्र त्र्यंबक (भाउराव) और लक्ष्मीबाई (मनुताई) चिपलूनकर के चार बेटों और सात बेटियों में सबसे बड़ी थीं। उनका मायके का नाम यशोदा था, लेकिन उनके छोटे भाई-बहन उन्हें प्यार से ‘जीजी’ कहकर बुलाते थे। बाद में, उन्हें लोग ‘माई’ कहकर पुकारने लगे। भाऊराव चिपलूनकर ठाणे जिले के जवाहर रियासत में दीवान थे। यमुनाबाई का बचपन खुशनुमा बीता। हालांकि वह चौथी कक्षा तक ही पढ़ पाईं। भाऊराव को अपनी बेटी के लिए पति तलाश करने में मेहनत नहीं करनी पड़ी। असल में सावरकर और भाऊराव एक-दूसरे को जानते थे। यशोदा (सावरकर के बड़े भाई बाबाराव की पत्नी) और यमुनाबाई दोस्त थे। सावरकर से यमुनाबाई के पिता प्रभावित थे। यमुनाबाई के पिता ने सावरकर के मामा और बड़े भाई बाबाराव से अपनी बेटी की शादी की बात चलाई जिस पर सभी राजी थे, लेकिन सावरकर के मामा ने अपने भांजे की पढ़ाई की खर्च उठाने की भाऊराव के सामने शर्त रखी जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। इस तरह यमुनाबाई और विनायक सावरकर फरवरी 1901 में शादी के बंधन में बंध गए।

सावरकर नहीं करते थे पूजा, पर पत्नी को करने से नहीं रोका
​​​यमुनाबाई को उस समय लोग माई बुलाते थे। वह एक साधारण महिला थीं जो सावरकर का बहुत ख्याल रखती थीं। उन्होंने उनकी छोटी-छोटी जरूरतों का ख्याल रखा, यह सुनिश्चित किया कि सारवरकर के कपड़े दुरुस्त हों। वह जब भी मौका मिलता सावरकर के साथ समय बितातीं। वह एक धार्मिक महिला थीं। वह प्रतिदिन पूजा करती थीं। सावरकर स्वयं पूजा पाठ करने में विश्वास नहीं रखते थे, लेकिन कभी भी यमुनाबाई को पूजा करने से नहीं रोका।

(साभार – दैनिक भास्कर)

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