सजावट, पैकेजिंग और संस्कृति का हिस्सा है बांस हस्तशिल्प

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बांस एक ऐसा पेड़ है जो भारत के हर प्रांत में पाया जाता है। ये लगभग 25 से 30 मीटर तक ऊंचा होता है और इसके पत्ते लंबे होते हैं। लेकिन शायद आप ये जानकर आश्चर्य में पड़ जायेंगे कि बांस के भी स्वास्थ्यवर्द्धक गुण होते हैं। इसके अलावा बांस के गुण रोगों के उपचार के भी काम आते हैं।

रायगढ़, जशपुर और सरगुजा जिलों में बहु उपयोगी और बहुतायत के साथ पाया जाने वाला हस्तशिल्प है – बाँस-शिल्प. बांस का काम करने वाले प्रायः तुरी या बंसोड जाति के लोग होते हैं। बाँस की अधिकांश वस्तुएं ग्रामीण दैनिक ज़रूरतों में काम आने वाली होती हैं. इसलिए ये बहुत बड़ी संख्या में बनती हैं और बिकती भी हैं। यह बंसोड़ो की आजीविका का प्रमुख साधन है. बाँस की वस्तुएं बनाने के लिए वैसे तो हरे बाँस की आवश्यकता होती है।

वन विभाग द्वारा जंगल से बांस-कटाई पर रोक है। ये किसानों से महंगे दामों में खरीदते हैं या फिर सूखा बाँस खरीद कर उसे पानी में डुबाकर रखते हैं। सबसे पहले एक विशेष प्रकार की छुरी ‘कर्री’ से बाँस की लम्बी पट्टियाँ छिली जाती हैं. यह काम प्रायः घर के बूढ़े लोग बैठे-बैठे करते हैं। उसके बाद इन पट्टियों को पुनः छीलकर और पतला किया जाता है।

यद्यपि आधुनिक प्रौद्योगिकी के उपयोग द्वारा बनांये गए उत्पादों, लकड़ी उत्पादों, विशेष रूप से सख्त, लकड़ी उत्पाद की तरह इस्तेमाल किये जाने के लिए तरह उपयुक्त है। सख्त लकड़ी की प्रजातियाँ जैसे टीक, साल, बांजु (ओक), मैफिल, माइकेला डी पटी रोकारपस आदि को परिपक्व होने में 80 वर्ष से भी ज्यादा समय लगता है जबकि बांस को परिपक्व होने में 4 वर्ष का समय लगता है। इस प्रकार जब हम बांस उत्पादों का उपयोग करते हैं उस समय हम कुछ हद तक लकड़ी का प्रतिस्थापन करते हैं जिसमें हम अपने वनों की सुरक्षा करते हैं जो हमारी धरती को अगली पीढ़ी के लिए हरा-भरा और स्वच्छ बनाते हैं।

छोटी छोटी टहनियों तथा पत्तियों को डालकर उबाला गया पानी, बच्चा होने के बाद पेट की सफाई के लिए जानवरों को दिया जाता है। जहाँ पर चिकित्सकीय उपकरण उपलब्ध नहीं होते, बाँस के तनों एवं पत्तियों को काट छाँटकर सफाई करके खपच्चियों का उपयोग किया जाता है। बाँस का खोखला तना अपंग लोगों का सहारा है। इसके खुले भाग में पैर टिका दिया जाता है। बाँस की खपच्चियों को तरह तरह की चटाइयाँ, कुर्सी, टेबुल, चारपाई एवं अन्य वस्तुएँ बिनन के काम में लाया जाता है। मछली पकड़ने का काँटा, डलिया आदि बाँस से ही बनाए जाते हैं। मकान बनाने तथा पुल बाँधने के लिए यह अत्यंत उपयोगी है। इससे तरह तरह की वस्तुएँ बनाई जाती हैं, जैसे चम्मच, चाकू, चावल पकाने का बरतन। नागा लोगों में पूजा के अवसर पर इसी का बरतन काम में लाया जाता है। इससे खेती के औजार, ऊन तथा सूत कातने की तकली बनाई जाती है। छोटी छोटी तख्तियाँ पानी में बहाकर, उनसे मछली पकड़ने का काम लिया जाता है। बाँस से तीर, धनुष, भाले आदि लड़ाई के सामान तैयार किए जाते थे। पुराने समय में बाँस की काँटेदार झाड़ियों से किलों की रक्षा की जाती थी। पैनगिस नामक एक तेज धारवाली छोटी वस्तु से दुश्मनों के प्राण लिए जा सकते हैं। इससे तरह तरह के बाजे, जैसे बाँसुरी, वॉयलिन, नागा लोगों का ज्यूर्स हार्प एवं मलाया का ऑकलांग बनाया जाता है। एशिया में इसकी लकड़ी बहुत उपयोगी मानी जाती है और छोटी छोटी घरेलू वस्तुओं से लेकर मकान बनाने तक के काम आती है। बाँस का प्ररोह (young shoot) खाया जाता और इसका अचार तथा मुरब्बा भी बनता है।

पिछले कुछ महीनों में केवीआईसी ने भारत के विभिन्न हिस्सों में, बम्बुसा तुलदा के लगभग 2,500 पेड़ लगाए हैं। अगरबत्ती निर्माताओं के लिए सही कीमत पर कच्चे माल की स्थानीय उपलब्धता को सुनिश्चित करने के लिए नासिक में नवीनतम वृक्षारोपण के अलावा दिल्ली, वाराणसी और कन्नौज जैसे शहरों में बम्बुसा तुलदा के 500 पौधे लगाए गए हैं।

पूर्वोत्तर भारत के साथ ही बिहार भी बांस हस्तशिल्प का प्रमुख केन्द्र है। खासकर छठ पूजा और शादियों के दौरान सूप, टोकरी, दउरा की माँग हमेशा बनी रहती है। होम डेकोर में फर्नीचर से लेकर सजावट और क्रॉकरी तक में बांस का इस्तेमाल हो रहा है। यह इको फ्रेंडली है इसलिए आज उपहार के लिए कॉरपोरेट की पसन्द तो है, साथ ही आज बांस गिफ्ट पैकेजिंग उद्योग का एक प्रमुख हिस्सा है क्योंकि पैकेजिंग में ट्रे से लेकर टोकरी तक के निर्माण के लिए बांस का इस्तेमाल हो रहा है तो बांस की बोतलें भी बढ़ रही हैं।

कोलकाता में मछुआ फलपट्टी और रवीन्द्र सरणी इलाके में कुछ दुकाने हैं जहाँ आप बांस का सामान देख सकते हैं। कुछ दुकानें तो 150 साल पुरानी हैं…देखिए हमारी वीडियो रिपोेर्ट –

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