सत्ता और बाजार के अतिक्रमण से आस्था और उत्सव को बचाना भी होगा

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शुभजिता फीचर डेस्क

आज दशमी है, विजयादशमी..और आप सभी को शुभ विजयादशमी। शुभजिता दुर्गोत्सव में कई मंडप देखे, कई प्रतिमाएँ देखीं और अब वातावरण में हर्ष और विषाद के सुर मिल गये हैं तो विचार भी उमड़ रहे हैं। दुर्गा पूजा हमारी आस्था, विश्वास और उल्लास का पर्व है। समय बदला तो इसमें मनोरंजन की मात्रा बढ़ी और इसके बाद बाजार का हस्तक्षेप भी बढ़ा और अब राजनीति का दखल भी बढ़ रहा है। जब तक सब कुछ सही अनुपात में हो, बुरा नहीं लगता। सबकी जरूरत है मगर अनुपात और हर चीज कितनी होनी चाहिए…यह शायद हम भूल रहे हैं।

मोहम्मद अली पार्क की पूजा में टीकाकरण एक थीम बना

परम्परा पर बाजार हावी हुआ मगर तब क्या करें जब आडम्बर हावी होने लगे और सारा प्रचार तंत्र उत्सव के आनन्द में इतना डूब जाये कि सही और गलत का फर्क भूलने लगे। सम्भवतः आपको लगे कि बातों को जटिल बनाया जा रहा है मगर आप खुद सोचिए तो क्या हमारी जीवन शैली ऐसी नहीं हो गयी कि हम असामान्य चीजों को भी चलन के नाम पर स्वीकार करने लगे हैं। उत्सव में राजनीति नहीं मिलनी चाहिए और विश्वास में तो बिल्कुल नहीं। सारा शहर बुर्ज खलीफा के जादू में मदहोश होता जा रहा है। माँ की प्रतिमा को सोने की साड़ी पहनायी जा रही है, करोड़ों के आभूषण पहनाये जा रहे हैं…जमकर सराहा जा रहा है मगर इसके पीछे जो अन्धेरा है, कभी उसके बारे में सोचिए…क्या मंडप बनाने वालों और माँ की प्रतिमा को बनाने वाले हाथों में हमने उम्मीद का एक भी दीया रखा है? कोई सवाल नहीं करेगा कि ये करोड़ों रुपये जो खर्च हो रहे हैं, उनका स्त्रोत क्या है.. ? कहीं ऐसा तो नहीं है कि हमारे उत्सव आडम्बर के साथ ही अब श्रद्धा के नाम पर काले को सफेद बनाने का खेल बन गये हैं।

इस राज्य में पूजा आयोजकों को बहुत प्रोत्साहन मिला है, आर्थिक सहायता और बिजली भी मिली है मगर किस कीमत पर मिली है, यह मंडप के बाहर प्रवेश द्वार को देखने पर समझ आ जाता है जब आप सरकारी योजनाओं से लेकर राजनेताओं के बड़े होर्डिंग्स देखते हैं। बंगाल में इस बार की पूजा में सरकारी योजनाओं का प्रचार जिस तरह से हुआ और हद तो तब हो गयी जब नेत्री को देवी बना दिया गया। क्या यह देवी की आराधना है…सरकारी योजनाएं जनता के लिए होती हैं…तो उनके लिए 2-4 बैनर काफी हैं लेकिन सत्ता और बाजार दोनों ही आस्था को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, यह गलत है। इधर बांग्लादेश में एक अफवाह के कारण माँ दुर्गा की प्रतिमायें तोड़ी जा रही हैं तो दूसरी तरफ किसानों से सहानुभूति के नाम पर राजनीति की रोटियाँ सेंकी जा रही हैं। सहानुभूति जताने के और भी तरीके हैं, व्यथा दर्शाने के और भी तरीके हैं मगर पंडाल के बाहर जूते – चप्पल और पैर दिखाकर क्या साबित करने की कोशिश की गयी, यह समझ के बाहर है। दूसरी तरफ ऐसे भी मंडप हमने देखे जो थोड़े में बहुत कुछ कह गये। बजट कम था मगर सन्देश बड़ा। सामाजिक कार्यों में पूजा आयोजकों को व्यस्त देखा गया। यह अच्छी बात है मगर सबसे पहले हमें खुद से सवाल करना होगा कि हम आधुनिकता के नाम पर स्वार्थ की जो गठरी ढो रहे हैं, वह हम कब तक ढो सकेंगे? अच्छी बात यह रही है कि कार्निवल के नाम पर माँ की प्रतिमाओं को लेकर होने वाला रोड शो नहीं हो रहा, वरना यह तमाशा भी आस्था के अपमान जैसा ही लगता है कई बार।

जनता का उत्सव सत्ता और बाजार के पास रह गया है और हम सब मन में जानते हैं कि ऐसा नहीं होना चाहिए। इस बार भी कोरोना का प्रभाव लगभग हर मंडप पर रहा…पूजा आयोजकों की थीम भी कोरोना बना तो कहीं पर माँ को कोरोनासुर का वध करते हुए दिखाया गया। हर मंडप में आयोजकों को जनता से मास्क पहनने, दूरी रखने और भीड़ से बचने का अनुरोध करते हुए देखा गया मगर हम सब जानते हैं कि पंडालों के बाहर स्थिति क्या रही। लोगों को मास्क पहनने में दिक्कत रही।

ऐसे में अगर कोरोना की तीसरी लहर दस्तक दे तो इसमें हैरत क्या? लॉक डाउन की परिस्थिति में बंगलों में रहने वालों पर शायद असर न हो मगर उनके बारे में सोचिए जो रोज कमाते हैं, तब पेट भरता है। उन बच्चों के बारे में सोचिए जो पिछले 2 साल से स्कूल का चेहरा तक नहीं देख सके हैं। शायद यह हमारे मन के विकार हैं जो इतनी बाधाएं आ रही हैं। आज विजयादशमी है, घाटों पर विर्सजन के लिए कतार लगेगी। सत्ता हो, बाजार हो या हम हों, उत्सव की गरिमा को बनाये रखना हमारा ही दायित्व है, इसे भूलना नहीं चाहिए। आश्छे बोछर में आस्था का बाजार न बने, बस यही प्रार्थना है, सुन रही हो न माँ?

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