समकालीन अंतर्विरोधों से मुठभेड़ करती कवितायेँ

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श्रवण कुमार

प्रत्यंचा युवा कवयित्री पंखुरी सिन्हा का हिंदी में तीसरा कविता संग्रह है। इसमें १४६ कवितायेँ हैं. आकार की दृष्टि से कुछ कवितायेँ छोटी हैं, लेकिन भाव और उद्देश्य दोनों बड़े हैं. इस संग्रह की रचनाएं वर्तमान को जस का तस स्वीकार नहीं करना चाहती हैं बल्कि समकालीन सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक विसंगतियों, अंधविश्वासों और पाखंडों के विरुद्ध सवाल दर सवाल खड़े करती हैं। भ्रूण हत्या शीर्षक कविता में वे कहती हैं–“औरत की देह को बनाने का नरक/हर ओर है नज़ारा/तुम जाओ न जाओ/डिस्पेंसरी आज/ लेकिन, मेरे दोस्त/तुम जगह के साथ साथ/अपनी देह को भी बना रहे हो नरक/रौंद कर सारी हरीतिमा……………..”
हर तरह के पुरुष वादी मापदंडों के खिलाफ प्रत्यंचा चढ़ाये युद्धरत कवयित्री सवाल करती हैं–“क्यों आकर ठहर जाती है/औरत की देह पर ही/जातिवाद, भाषावाद/क्षेत्रवाद और प्रांतीयता/की सब लड़ाइयां?”
युवा कवयित्री अपनी रचना के माध्यम से दलित उत्पीड़न के खिलाफ भी मज़बूती से आवाज़ उठाती हैं. यह आवाज़ प्रतिरोध की सीमा तक पहुँच जाती है. बतौर कवयित्री–“ये दलितों की बस्ती जलाना/ये उनकी औरतों का अपमान/कैसे है जायज़/इतने थानों के रहते हुए ज़िंदा?/और कहीं नहीं मिली है/उन पुरुषों को सजा देने की खबर/जिन्होंने तस्वीरें खींची/उतार कर औरतों के कपड़े/ये एक बड़ा जुर्म बनता जा रहा है/आये दिन बलात्कार की घटना के साथ/यह कैसा समाज है/जिसके लोग कुत्ते बनने पर उतारू हैं?”
आज की बाज़ारवादी एवं उपभोक्तावादी संस्कृति के दौर में सभी वस्तुएं बिकाऊ हो गयी हैं. समाज में एवं मीडिया की सुर्खिओं में वे ही लोग दिख रहे हैं जो या तो विक्रेता हैं या क्रेता। रिश्तों से लेकर वस्तुओं तक का पुराना ढांचा ध्वस्त हो रहा है. देश साम्राज्यवादी एवं हथियारों के व्यापारी युद्ध लोलुप अमेरिका और उनके सहयोगियों के पीछे भाग रहा है. और हम बाज़ार के पीछे। हम सब कुछ बेचने पर उतारू है–जल, ज़मीन, जंगल, अपना ज़मीर और अपनी कविता भी. ज़्यादातर रचनाकार पद, पुरस्कार और पैसे के पीछे भाग रहे हैं. बतौर कवयित्री—“बाज़ारू कर भाषा को/कविता को भी/कुछ लोग वाक़ई बाज़ार बन जाते हैं/और लगाते हैं कविता का हाट बाज़ार।”

सचमुच रचनाकारों के भी दो वर्ग होते हैं या हमेशा से होते आये हैं—जनता के रचनाकार एवं सत्ताधारी वर्ग के चारण रचनाकार। इस दृष्टि से यह संग्रह समकालीन अंतर्विरोधों से मुठभेड़ करता दिखाई पड़ता है.
सुन्दर मुख्यपृष्ठ और आकर्षक आवरण में बंधी ये कवितायेँ, अधिकांशतः अपने तेवर में राजनैतिक हैं, अपने पर्यावरण सम्बन्धी सरोकारों में विशेषकर, एवं लचर होती व्यवस्था के भ्रष्टाचार की धज्जियाँ उड़ाती हैं.
हमारा समाज एक पुरुष प्रधान मनुवादी समाज है. प्रभु वर्ग ने हमारे चारो तरफ अपने रक्षार्थ बहुत सारा मायाजाल फैला रखा है. और हम हैं कि उसी कुएं में उलझे पड़े हैं. न निकलने का नाम लेते हैं और न कोशिश करते हैं. ये मायाजाल मोहजाल हमारी सभ्यता के विकास के सबसे बड़े रोडे हैं—“ हम कभी तो निकलेंगे/धर्म के जंजाल से/जातियों के मोहजाल से/कर्मकांडों के मायाजाल से/कि प्रगति सचमुच हमारी राह देखती है.”
इस संग्रह की एक कविता है ‘भड़कती अस्मिता’, जिसमें सामप्रदायिक उन्मादों के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करती है कवयित्री–“लेकिन किस मुंह से गौरक्षक पीट रहे हैं/गो मांस ले जाती गाड़ियों के चालकों को/जबकि उन्हीं की पार्टी के महानुभाव नेता/बीफ एक्सपोर्ट का कर रहे हैं/करोड़ों का बिज़नेस/आखिर ये क्या अर्थ तंत्र है/जिसमें दाल मंगा रहे हैं/अफ्रीका से/और अरब देशों को बेच रहे हैं जो मांस!”
वैसे तो १४६ कविताओं के इस संग्रह में सभी कवितायेँ पठनीय एवं उद्देश्य पूर्ण हैं लेकिन एक कविता ऐसी भी है जिसमें कवयित्री अपने पंखुरी नाम को विषय बनाकर बड़ी खूबसूरती से कुछ अनमोल बातें कहना चाहती हैं—“खुशबुओं का आलय मैं/दीप मुझमें जलते हैं/दिखा सकती हूँ तुम्हें राह/जब होती हूँ सफ़ेद भी/अँधेरे में चमक हूँ/रौशनी में ठंढक/”. इसी क्रम में वे आगे कहती हैं—“चिड़ियों का जीवन हूँ मैं/पराग मुझमें बसते हैं/मैं पंखुरी हूँ, मुझमें सृष्टि के अष्टयाम बजते हैं /मैं अधूरी नहीं/फूल मुझमें बनते हैं.”
इसके अलावे, झपसी महतो की चाय दुकान में बारिश का दिन, नॉन-ब्रांडेड शहद और नया जी एस टी कानून, बारिश के दिन की गोधूलि और ड्रैगन नृत्य, सब खाली है, मन वीराना, ठीक चुनाव के दिन, ज़िन्दगी का रंग, आलिशान मज़ार, कविता का हो जाना, प्रेम का ध्वंस राग, देह से उगेंगे वृक्ष, कौन सा राम राज्य, घास के घूस खोर, जंजीरों में जकड़े लोग, एक वैलेंटाइन डे सीरिया युद्ध बीच, रॉंग नंबर, प्रेम और समाप्ति आदि कवितायेँ हम जैसे पाठकों को अत्याधिक प्रभावित करती हैं।

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