साहित्य की अनमोल धरोहर हैं मध्ययुगीन कवयित्री तुलछराय के पद

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प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, आज मैं आपका परिचय मध्ययुगीन कवयित्री तुलछराय से करवाऊंगी। इनका समय संवत 1850 के आस-पास माना जाता है। तुलछराय जोधपुर के महाराजा मानसिंह की आश्रिता या रक्षिता थीं। वही मानसिंह जिन्होंने तेरह विवाह किये थे और इसके अलावा भी उनकी बहुत सी उप पत्नियां थीं। इन्हीं में से एक थीं तुलछराय। इसके अतिरिक्त इनका और कोई परिचय नहीं मिलता। वैसे भी भारतीय समाज में स्त्रियों का कोई विशेष परिचय तो होता नहीं है। जिसके साथ रही, उसके नाम से जानी गई। पति और समाज ने मान दिया तो रानी का ओहदा मिला अन्यथा दासी, आश्रिता या बेहद अपमानजनक शब्द, रक्षिता। तुलछराय को भी इस असम्मानजनक स्थिति को झेलना पड़ा होगा लेकिन निराश्रित या पारिवारिक संरक्षण से वंचित स्त्री के लिए इस तरह के आश्रय को स्वीकारने के अलावा और कोई रास्ता भी नहीं था। इस स्थिति में एक रास्ता भक्ति की ओर सहजता से ले जाता है। और इस मार्ग पर दासी, रानी या रक्षिता में कोई विशेष अंतर नहीं रहता। अपनी सपत्नी अर्थात राजा मानसिंह की पत्नी प्रताप कुंवरी बाई जो तीजण भटियाणी के नाम से ख्यात थीं और  रामभक्ति पर केंद्रित पंद्रह ग्रंथों की रचना की थी, की संगति में इन्होंने भी भक्ति मार्ग की ओर कदम बढाए एवं काव्य रचना आरंभ की। इन्होंने भी राम को ही अपना आराध्य देव बनाया। राम की भक्ति में डूबकर लिखी गई इन रचनाओं में तुलछराय ने स्वयं को राम के प्रति पूर्णतः समर्पित कर दिया है। सामाजिक प्रतिष्ठा न मिल पाने की स्थिति में भक्ति के द्वारा मुक्ति का रास्ता सहज रूप से आकर्षित करता है। भक्तिन के रूप में एक तरह का समादर न भी सही महत्व तो मिलता ही है जो विलासिता में डूबी रानी या रक्षिता को प्राय: नहीं मिलता। साथ ही अपने हृदय की भावनाओं को भक्ति की चाशनी में लपेटकर अभिव्यक्ति देने का मार्ग भी सुलभ हो जाता है। तुलछराय जैसी स्त्रियों के लिए भक्ति का रास्ता पलायन का नहीं बंधनों के प्रति थोड़ा ही सही, विद्रोह का सुलभ रास्ता था। अपनी दीन‌ दशा से मुक्ति के लिए राम को आर्त भाव से पुकारती हुई तुलछराय के पदों में मध्ययुगीन स्त्री की पीड़ा और बंधनों से मुक्ति की छटपटाहट को सहजता से अनुभूत किया जा सकता है। राम से अपनी सुध लेने का आग्रह करती हुई कवयित्री कहती हैं-

“मेरी सुध लीजो जी रघुनाथ।

लाग रही जिय केते दिन की, सुनो मेरे दिल की बात।

मोको दास जान सियाबर, राखो चरण के साथ।

तुलछराय कर जोड़ कहे, मेरो निज कर पकड़ो हाथ।”

एक और पद देखिए जिसमें कवयित्री अपने आराध्य देव का स्वरूप वर्णन करती हुई, उन पर न्यौछावर होती हुई उनसे अपने ह्रदय में बस जाने का आग्रह करती हैं –

“सियावर श्याम लगे मोहे प्यारे हैं।

क्रीट मुकुट मकराकृत कुण्डल हाल तिलक सुखकारो है।

मुख की शोभा कहा कहूं उनकी, कोटि चंद उज्यारो है।।

गल बिच कंठी है रतनारी, बनमाला उर धारी है।

केसरिया जम जरकस को, दुपटो लाल लप्पारी है।।

पीताम्बर पट कटि पर सोहे, पायन झंझर न्यारी है।

तुलछराय कहे मो ह्रदय बिच, आय बसों धनुधारी है।।”

इस पद में भक्ति और प्रेम का प्राबल्य इतना अधिक है कि राम और‌ कृष्ण में कोई विशेष अंतर‌ नहीं रहा है। कवयित्री राम का स्वरूप चित्रित करती हैं लेकिन पाठकों को पढ़ते हुए ऐसा लगाता है मानो दृष्टि के समक्ष कृष्ण की सांवरी सूरत चित्रित हो उठी हैं। इस पद‌ को पढ़ते हुए मीराबाई का पद “बसों मेरे नैनन में नंदलाल” का स्मरण अनायास हो आता है। एक और पद में कवयित्री राम के साथ होली खेलने का प्रसंग सृजित करती हैं जिसे पढ़ते हुए राम की जगह कृष्ण का स्वरूप ही दृष्टि के समक्ष साकार हो उठता है-

“सीताराम जी से खेलूं मैं होरी। भर लूं गुलाल की झोली।।

सजकर आई जनक किशोरी। चहुं बंधुन की जोरी।

मीठे बोल सियावर बोलत। सब सखियन की तोरी।।

 हंसे हर सूं कर जोरी।”

दरअसल सखी या सपत्नी के प्रभाव से तुलछराय ने राम के प्रति अपनी भक्ति तो प्रकट की लेकिन उनके द्वारा सृजित पदों में राम और‌ कृष्ण दोनों आपस में घुल-मिल गए हैं। दरअसल भक्ति, रूढ़ियों में जकड़ी मध्ययुगीन स्त्री के लिए ताजा हवा के झोंके की तरह थी। कुछ भी लिखना या अपने को अभिव्यक्त कर पाना ही उसके लिए मुख्य था। चूंकि सामाजिक बंधन ऐसे थे कि भक्ति के अतिरिक्त स्त्रियों के लिए और कोई रास्ता बचता नहीं था इसलिए राजकुल से संबंधित अधिकांश मध्ययुगीन स्त्रियों ने सामाजिक मर्यादा का निर्वाह करते हुए भक्ति की राह चुनी।  लेकिन इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि भक्ति के माध्यम से ही ह्रदय में संचित कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति भी अनायास हो जाती थी। आराध्य देव के प्रति प्रेम का स्फुरण और उसका प्रकटन बेहद स्वाभाविक था। इसी कारण अपनी सामाजिक मर्यादा की रक्षा करते हुए भक्त नारी अपने आराध्य देव राम की मूर्ति को अपने ह्रदय में बसा लेने का स्वप्न देखती है या उनके साथ होली खेलना चाहती है। इसी तथ्य की ओर संकेत करती हुई और तुलछराय के पद को उदाहरणस्वरूप प्रस्तुत करती हुई डॉ. सुमन राजे अपनी पुस्तक “इतिहास में स्त्री” में लिखती हैं- “रामकाव्य लिखते समय भी राम का चरित्र भर स्वीकार किया गया है, अनुभूति और अभिव्यक्ति वही कृष्णकाव्य की ही रही। संभव है राम भक्ति के ‘रसिक’ संप्रदाय का प्रभाव रहा हो या नारी जीवन की ‘कोमल- वृत्ति’ का तकाजा।”

उपास्य देव कोई भी क्यों ना हो, उपास्य के प्रति समर्पित तुलछराय के पदों में भक्ति की सहज स्वाभाविक एवं मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। जहाँ बहुत से लोग भक्त कवयित्री तुलछराय के नाम से भी अपरिचित हैं वहीं कुछ ऐसे भी साहित्यकार हैं जो उनके साहित्यिक अवदान को स्वीकारते हुए भक्ति साहित्य में उनके महत्व को रेखांकित करते हैं।  शांता भानवत अपनी पुस्तक “मध्यकालीन राजस्थानी काव्य के विकास में कवयित्रियों का योगदान” में लिखती हैं- “भाव, भाषा और शैली की दृष्टि से राम-काव्य धारा की कवयित्रियों में तुलछराय का भी गौरवपूर्ण स्थान है। विरहानुभूति कवयित्री के पदों का शृंगार है।” तुलछराय का कोई स्वतंत्र ग्रंथ‌ नहीं मिलता। यत्र -तत्र बिखरे इनके फुटकर पद अवश्य मिलते हैं। सहज- सरल राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा में सृजित ये पद साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। 

 

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