सुजान : हीनता होय जो हिम्मत की तो प्रबीनता लै कहा कूप में डारै”

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प्रो. गीता दूबे

ऐ सखी सुन 14

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों हमारे समाज में बहुत सी प्रेम कहानियाँ मशहूर हैं और साहित्य में भी। मैं काल्पनिक प्रेम कहानियों की ही बात नहीं कर‌ रही सखियों बल्कि उन साहित्यकारों की प्रेम कहानियों की बात कर रही हूं जो साहित्य की दुनिया में बहुत चर्चित तो रहीं लेकिन एक छद्म उनके साथ यह रहा कि बहुत बार उन प्रेम कथा की मशहूर नायिकाओं को वास्तविक न मानकर काल्पनिक करार‌ कर दिया गया। शायद‌ यह भी इतिहास का एक प्रचलित षड्यंत्र है जिसके तहत स्त्री के उस अस्तित्व को‌ मिटाने की भरपूर कोशिशें हुईं जिनका व्यक्तित्व ही नहीं कृतित्व भी प्रभावशाली रहा हो। यह बात और है कि समाज‌ में अपनी मकबूलियत और मशहूरियत के बावजूद वह हाशिए पर ही रहीं। और हमारा तथाकथित सभ्य समाज जब हाशिए के इस ओर की स्त्रियों को ही उनका प्राप्य नहीं देता तो भला हाशिए के उस ओर की स्त्रियों को भला क्यों बर्दाश्त करता इसीलिए कह दिया गया कि वह तो कवि की कल्पना या ईश्वर का प्रतीक थी। सखियों आज मैं आपको एक ऐसी स्त्री या सखी की कथा सुनाती हूं जो एक संवेदनशील स्त्री, महाकवि घनानंद की प्रेमिका एवं स्वयं भी एक सशक्त कवयित्री थीं। जी हां, सही समझा आपने, मैं सुजान की बात कर‌ रही हूं। वही सुजान जिन पर घनानंद न केवल अपनी जान‌ निछावर‌ करते थे बल्कि जिनके नाम के बिना घनानंद की कविता पूरी ही नहीं होती। घनानंद और सुजान की प्रेम कहानी हिंदी साहित्य के इतिहास के पन्नों पर भले ही दर्ज हो लेकिन बहुत से लोग इस कहानी को एक काल्पनिक कहानी भी मानते हैं। 

यह कहानी एक संवेदनशील कला प्रेमी कवि और एक कवयित्री की कहानी भी है। घनानंद मुगल बादशाह  मुहम्मद शाह “सदारंग” जिन्हें मुहम्मद शाह “रंगीला” भी कहा जाता था, के‌ दरबार‌ में मीर मुंशी थे और सुजान दरबार की राजनर्तकी, जिसकी कला और सौन्दर्य पर तमाम दरबारी ही नहीं घनानंद भी मुग्ध थे। घनानंद के इस प्रेम की खबर सभी दरबारियों को‌ बखूबी थी। दरबारियों ने‌ घनानंद को बादशाह की नजर से गिराने और‌ दरबार से हटाने के लिए एक कुचक्र रचा। कहा जाता है कि एक दिन दरबारियों ने बादशाह से कहा कि मीर मुंशी साहब बहुत अच्छा गाते हैं, बादशाह के आग्रह करने पर‌ भी जब घनानंद ने गीत नहीं सुनाया तब उन्हीं कुचक्री दरबारियों ने कहा कि अगर सुजान आग्रह करे तो घनानंद अवश्य गाएंगे। बादशाह के कहने पर‌ सुजान ने आग्रह किया और उनके प्रेम के रंग में रंगे घनानंद ‌ने बादशाह की ओर पीठ करके, सुजान की ओर देखते हुए गीत सुना दिया। उस गीत ने बादशाह को बहुत अधिक प्रभावित किया लेकिन बादशाह तो बादशाह ठहरा, जिसने घनानंद के व्यवहार को‌ बेअदबी और अपनी तौहीन समझा और देश-निकाला दे दिया। घनानंद ने सुजान से भी साथ चलने की याचना की लेकिन सुजान की निष्ठा और प्रतिबद्धता राजा और‌ दरबार के प्रति थी, अतः उन्होंने साथ चलने से इंकार कर दिया। उनके मन में राज भय भी हो सकता था। इतिहास गवाह है कि शाही दरबार की न जाने कितनी नर्तकियों को राजा के अतिरिक्त किसी और से प्रेम करने के अपराध में मौत के घाट उतार दिया गया है। इस कथा एक पहलू यह भी हो सकता है कि संभवतः घनानंद का प्रेम एकतरफा रहा हो और‌ शायद इसीलिए सुजान ने उनका साथ नहीं दिया।

इस प्रेमकथा का एक और‌ दिलचस्प पहलू यह भी है कि सुजान सिर्फ नर्तकी नहीं थीं बल्कि वह कविताएँ भी लिखा करती थीं। घनानंद के कवित्त में चित्रित सुजान की बात तो खूब होती है लेकिन कवयित्री सुजान समय के साथ भुला दी गईं।  सुजान के कवित्त भी बहुत सी प्राचीन और मध्ययुगीन कवयित्रियों की तरह इतिहास के गलियारे में गुम हो गये। उनके एक कवित्त में एक स्त्री की पीड़ा और उसका अंतर्द्वन्द्व बखूबी अभिव्यक्त हुआ है-

“बेदहूँ चारि की बात को बाँचि, पुरान अठारह अंग में धारै।

चित्रहूँ आप लिखै समझे कबितान की रीति में वार ते पारै।।

राग को आदि जिती चतुराई ‘सुजान’ कहै सब याही के लारै।

हीनता होय जो हिम्मत की तो प्रबीनता लै कहा कूप में डारै।”

संभवतः सुजान के मन में इस बात की कसक ताउम्र बनी रही कि वह हिम्मत या साहस की कमी के कारण अपने समर्पित प्रेमी घनानन्द का साथ नहीं दे पाईं। जब प्रिय हमेशा के लिए दृष्टि की ओट में हो जाता है, समय की धारा में विलीन हो जाता है तो उसकी कमी खटकना स्वाभाविक ही है और इसी कारण संभवतः सुजान स्वयं को कोसती हैं कि अगर हिम्मत की कमी हो तो सारी प्रवीणता धरी रह जाती है। मजबूरियों ने सुजान के पैरों इस तरह जकड़ा कि साहित्य के इतिहास में उनकी छवि एक निष्ठुर प्रेमिका की बन गई । अब यह बात तो सुजान ही जानती होंगी कि इस निष्ठुरता के पीछे कौन सी झिझक या विवशता काम कर रही है। भारतीय स्त्री सदियों से ऐसी विवशताओं के बंधन में बँधकर अपने ह्दय की बात दबाकर रखती है इसीलिए सुजान के प्रति अपनी सोच को हमें बदलना चाहिए। सुनो सखियों, स्त्रियों की छवि निर्मित करने या गढ़ने में पितृसत्तात्मक समाज की बड़ी भूमिका रही है, समय आ गया है कि हम सबको अपनी संगठनात्मक शक्ति के बल पर इस भूमिका को बदलने की दिशा में पहल करनी चाहिए। फिलहाल विदा सखियों। अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी, एक नयी कहानी के साथ।    

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