स्टार्टअप की तैयारी है…तो रहिए इन सुझावों के साथ तैयार

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स्टार्टअप देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार सृजन की दिशा में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं । स्टार्टअप की सफलता के पीछे कड़ी कल्पनाशीलता ही नहीं बल्कि एक सुद्ढ़ विचार, असफलता, हताशा और इस पर भी हार न मानकर लगातार काम करने की कोशिश ही सफलता का आधार बनती है । नये उद्यमियों के लिए यह लेख हम नवभारत टाइम्स से साभार यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं और मूल लेख में बहुत अधिक सम्पादन किये बगैर जिससे…उनको मदद मिले –

———————————————————————————————–     स्टार्टअप के लिए काफी लोग आइडिया तो पक्का कर लेते हैं लेकिन उसे धरातल पर कैसे लाएं, इसी में उलझे रहते हैं। कुछ इसे शुरू भी करते हैं, लेकिन प्लानिंग सही न होने से वह स्टार्टअप ज्यादा दिन टिक नहीं पाता। अमेरिका में नस्लभेद के खिलाफ आंदोलन शुरू करने वाले मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने कहा था- अगर आप उड़ नहीं सकते तो दौड़ें, दौड़ नहीं सकते तो चलें, अगर चल भी नहीं सकते हैं तो रेंगते हुए चलें, लेकिन हमेशा आगे बढ़ते रहें। यही बात स्टार्टअप पर भी लागू होती है। ‘यार, इस दिमाग में आइडिया तो धांसू हैं लेकिन शुरू कैसे करें, बस यह समझ नहीं आता।’ यह लाइन आपने भी किसी ऐसे शख्स से सुनी होगी जो अपना स्टार्टअप शुरू करना चाहता है। आपको ऐसे भी लोग मिले होंगे जो पिछले 1-2 या इससे ज्यादा बरसों से यही बात कह रहे होंगे। ऐसे लोग सिर्फ बातें करते हैं, शुरुआत नहीं करते। ऐसे लोगों को मार्टिन लूथर किंग जूनियर की ऊपर बताई बातों से सबक लेना चाहिए। लेकिन रुकें, कोई भी कदम उठाने से पहले कागजी कार्रवाई जरूर करें। कार्रवाई यानी अपने स्टार्टअप का प्लान पहले कागजों पर तैयार करें। इसमें उन चीजों को शामिल करें जिनकी जरूरत स्टार्टअप शुरू करने के लिए पड़ेगी। मसलन, स्टार्टअप अकेले शुरू करना है कि पार्टनरशिप में? कहां से शुरुआत करनी है? फंड की जरूरत पड़ती है तो कहां से लें? अपना प्रॉडक्ट या सर्विस मार्केट में कैसे लॉन्च करें? आदि। आइडिया  फाइनल होने पर उसे स्टार्टअप के रूप में कैसे शुरू करें, एक्सपर्ट्स से जानकारी लेकर बता रहे हैं राजेश भारती।

आइडिया लागू करने की गाइड
किसी भी आइडिया को लागू कैसे किया जाए, इसके कई तरीके हो सकते हैं। आइडिया को लागू करने के लिए पहले इन चीजों की रूपरेखा तैयार कर लें:

टीम के बारे में सोचें
आइडिया का चुनाव आपने किया है तो उसे अकेले ही लागू करने की कोशिश करने से बचें। इसके लिए बेहतर है कि एक टीम बनाएं। इस टीम में अपने साथ को-फाउंडर को जोड़ें। लेकिन पहले यह जान लें कि किसी भी कंपनी में फाउंडर और को-फाउंडर कौन होते हैं:
 संस्थापक ( फाउंडर): किसी भी कंपनी में फाउंडर वह शख्स होता है जो कंपनी शुरू करने का आइडिया लाता है और कंपनी की शुरुआत करता है। इसे हम कंपनी का मालिक भी कह सकते हैं। कंपनी में किसी बदलाव का पहला फैसला फाउंडर ही करता है।
सह संस्थापक (को-फाउंडर): फाउंडर जब कंपनी की शुरुआत करता है तो उसे कंपनी चलाने के लिए एक या एक से ज्यादा पार्टनर की जरूरत पड़ती है। पार्टनर कंपनी शुरू करने में इन्वेस्टमेंट से लेकर टेक्नॉलजी या दूसरी चीजों की जिम्मेदारी संभालने वाला होना चाहिए। अब बात आती है कि अच्छा को-फाउंडर कैसे चुनें? किसी को भी को-फाउंडर नहीं बना सकते। को-फाउंडर एक तरह से शादी के बंधन जैसा होता है। साथ चले तो अंत तक, नहीं तो किसी भी बात पर आपस में बिगड़ सकती है और वह आपसे ‘तलाक’ लेकर कंपनी से अलग हो सकता है।

को-फाउंडर चुनते समय इन बातों का ध्यान रखें:
– को-फाउंडर कोई भी शख्स हो सकता है, जैसे वह आपका कोई मित्र, कोई रिश्तेदार या परिचित। आप एक अच्छा को-फाउंडर लिंक्डइन पर भी ढूंढ सकते हैं।
– हमेशा ऐसा को-फाउंडर चुनें जो खुद स्टार्टअप शुरू करने के बारे में सोच रहा हो या बिजनेस में रुचि रखता हो।
– अगर आपकी टेक्नॉलजी, मार्केटिंग, फाइनैंशल आदि में पकड़ नहीं है तो ऐसा को-फाउंडर चुनें जिसकी इन चीजों में पकड़ हो ताकि स्टार्टअप को चलाने में आसानी हो।
– वहीं अगर स्टार्टअप शुरू करने में फंड की कमी है और आप बैंक से लोन या किसी दूसरे शख्स से रकम उधार लेना नहीं चाहते तो ऐसा को-फाउंडर भी चुन सकते हैं जो फंड की कमी पूरी कर दे।
– को-फाउंडर में आपके बिजनेस को समझने की इच्छाशक्ति होनी चाहिए। साथ ही वह काम के प्रति ईमानदार हो और उसमें नई-नई चीजें सीखने का गुण होना चाहिए।
ये लोग भी हों टीम में…
सह संस्थापक के अलावा टीम में ऐसे लोग भी शामिल होने चाहिए जो आपके प्रोडक्ट या सर्विस को कस्टमर तक पहुंचाने में मदद करें। इसमें सोशल मीडिया एक्सपर्ट से लेकर सेल्स मैनेजर तक हो सकते हैं। इन लोगों का चुनाव करते समय इनके पिछले रिजल्ट को देखें। अगर किसी ने पिछली कंपनी में अच्छी सर्विस दी है और वह अनुभवी है तो उसे अपनी कंपनी में हायर करने से न घबराएं, चाहे इसके लिए उसे कुछ ज्यादा सैलरी पर ही क्यों न रखना पड़े। वहीं अगर कोई नया शख्स है तो उसके काम करने की क्षमता देखें। इस प्रकार आप अपने स्टार्टअप के लिए एक अच्छी टीम तैयार कर सकते हैं। ध्यान रखें कि शुरुआत में छोटी टीम बनाकर काम करें। जब आपका काम फैलने लगे और बड़ी टीम की जरूरत पड़ने लगे, तभी टीम को बड़ा करें। इस दौरान उतने ही लोगों की भर्ती करें जितने की जरूरत हो।
टाइमलाइन जरूर बनाएं
जब आप अपने आइडिया को लागू करने के बारे में सोच रहे हैं तो दो तरह की टाइमलाइन जरूर बनाएं। पहली स्टार्टअप को लॉन्च करने की और दूसरी भावी योजना । स्टार्टअप सफलतापूर्वक लॉन्च करने की कोई एक तारीख तय करें और उसमें जी-जान से लग जाएं। अब बात आती है फ्यूचर प्लानिंग की। इसके लिए थोड़ा पीछे जाएं। उस समय को याद करें जब आपके दिमाग में स्टार्टअप शुरू करने का आइडिया आया था। सोचिए, आखिर आपने स्टार्टअप शुरू करने का फैसला क्यों लिया? क्या पैसा कमाने के लिए या समाज सेवा के लिए? मकसद जो भी हो, स्टार्टअप शुरू करते समय 3 से 5 साल का प्लान बनाएं। यह न सोचें कि स्टार्टअप शुरू करते ही सफलता मिलनी शुरू हो जाएगी। इसमें 1 से 2 साल तक लग सकते हैं। हालांकि इस दौरान टेक्नॉलजी और अपने प्रतियोगियों पर नजर रखने का भी प्लान बनाएं ताकि कहीं ऐसा न हो कि आप अपने स्टार्टअप की सफलता के लिए 1 से 2 साल का इंतजार कर रहे हैं और इस समय में कोई दूसरा स्टार्टअप आया और आपको आंधी की तरह उड़ा कर चला गया। अब आपका फ्यूचर प्लान जो भी हो, लेकिन आपको रिजल्ट का प्लान जरूर बनाना चाहिए। यहां रिजल्ट से मतलब है कि आपको उस समय की टाइमलाइन फिक्स करनी होगी जब आप नो प्रोफिट, नो लॉस पर आएं। यह समय 2 या 3 साल से ज्यादा का नहीं होना चाहिए।
वित्तीय योजना की बारी
स्टार्टअप की रूपरेखा तैयार करने के दौरान सबसे जरूरी है कि फाइनैंशल प्लान बनाएं। किसी भी स्टार्टअप को शुरू करने के लिए रकम की जरूरत तो पड़ेगी ही। पहले साल के लिए फाइनैंशल प्लान बनाते समय लागत, सैलरी, प्रचार आदि में लगने वाली अनुमानित रकम का 10% ज्यादा लेकर चलें। हर साल महंगाई दर बढ़ती है। फाइनैंशल प्लान में इन चीजों को जरूर शामिल करें:
– प्रोडक्ट की बिक्री का पूर्वानुमान
– लाभ और हानि

कम खर्च में मार्केट में आएं: मार्केट में उतरते समय कम से कम खर्च करें। प्रोडक्ट के प्रचार और प्रसार के लिए शुरुआत में बेसिक प्लैटफॉर्म बनाएं। फोकस इस बात पर हो कि पहले लोगों को आपके स्टार्टअप के बारे में पता चले।
बात यहां कम खर्च में शुरुआत करने की है। शुरुआत साइकिल या बाइक से कर सकते हैं। बाद में चाहें तो बीएमडब्ल्यू, ऑडी या फरारी कार से भी कनॉट प्लेस पहुंचा सकते हैं। इस दौरान कस्टमर से बात करें और उसका फीडबैक लें। अगर आपको लगता है कि कस्टमर को अच्छी सुविधा चाहिए और वह ज्यादा पैसे खर्च करने के लिए तैयार है तो उसका भी रोडमैप बनाएं और अपने बिजनेस में बदलाव करें।
इमरजेंसी फंड भी बनाएं
इमरजेंसी फंड सिर्फ घर के खर्चों के लिए ही नहीं बनाते, इसे स्टार्टअप के लिए भी बनाएं। मान लीजिए, अगर कोई शख्स आपके प्रोडक्ट या सर्विस की खराब क्वॉलिटी या किसी दूसरी चीज को लेकर कोर्ट चला जाता है तो इसमें होने वाले खर्चे के लिए भी तैयार रहें। यह वह खर्च होता है जो अमूमन स्टार्टअप के नियमित खर्चों में शामिल नहीं होता। इसलिए स्टार्टअप के लिए भी इमरजेंसी फंड बनाएं। यह फंड स्टार्टअप के सालाना खर्च के बराबर होना चाहिए।
जगह का चुनाव करें
स्टार्टअप शुरू करने का खाका तैयार करते समय उस जगह का चुनाव करें जहां से आप अपना स्टार्टअप शुरू करना चाहते हैं। कई बार गलत जगह का चुनाव स्टार्टअप को शुरू करने से पहले ही खत्म कर सकता है। मान लीजिए, आप खाने से जुड़ा स्टार्टअप शुरू करना चाहते हैं। ऐसे में आपको आउटलेट ऐसी जगह खोलने होंगे जहां ज्यादा संख्या में लोग आते हों और रुकते हों या ढेर सारे ऑफिस हों। इसे हम फुटफॉल भी कहते हैं। फुटफॉल यानी ऐसी जगह जहां काफी संख्या में लोग घूमने या शॉपिंग करने आते हैं। ऐसे में खाने से जुड़ा आपका आउटलेट चल जाएगा। वहीं अगर आप किसी रोड के किनारे ऐसी जगह आउटलेट खोलते हैं जहां लोग कम आते-जाते हों और कम रुकते हों तो वहां आपका आउटलेट चलना मुश्किल है। ऐसे में वहां चाहे मेट्रो स्टेशन हो या कोई बस स्टॉप।
हाल ही में नोएडा के सेक्टर 18 में मात्र 7.59 वर्ग मीटर के एक कियोस्क की बोली लगी। आप जानकर हैरान हो जाएंगे कि एक शख्स उस कियोस्क के लिए हर महीने 3.25 लाख रुपये का किराया देने को तैयार हो गया। यह तब है जब कियोस्क का बेसिक किराया मात्र 27 हजार रुपये महीने था। अब सोचिए कि वह 3.25 लाख रुपये किराया देने के लिए क्यों तैयार हुआ? क्योंकि जिस जगह वह कियोस्क है, वहां रोजाना हजारों लोग आते हैं। यह है जगह की वैल्यू।
एक और उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए, आप सब्जी या फलों से जुड़ा कोई स्टार्टअप शुरू करना चाहते हैं। आपका प्लान है कि अपने स्टार्टअप के प्रोडक्ट या सर्विस को पूरे भारत में लॉन्च किया जाए। इसे दो तरह से लॉन्च करने की प्लानिंग बना सकते हैं:
पहला तरीका: आप किसी एक राज्य का चुनाव करें और उसके प्रमुख शहरों में ही लॉन्च करने की योजना बनाएं। इसके बाद भरपूर प्रचार करें और धीरे-धीरे पूरे भारत में लॉन्च कर दें। हालांकि इसका एक नुकसान यह भी है कि अगर आप एक ही राज्य में फोकस करेंगे तो आपका आइडिया कोई और चुरा लेगा और आपके बिजनेस मॉडल पर अपना स्टार्टअप दूसरे राज्यों में शुरू कर देगा। जब आप उन राज्यों में जाएंगे तो आपको वहां पैर जमाने में मुश्किल होगी। इससे बचने का तरीका है कि आप जब दूसरे राज्यों में जाएं तो वहां मौजूद आपके बिजनेस मॉडल वाली कंपनी की कमियों को देखें और उन्हें लोगों से उसे दूर करने का वादा करके मार्केट में आएं।
दूसरा तरीका: हर राज्य की राजधानी में अपने प्रोडक्ट या सर्विस को लॉन्च करने की प्लानिंग करें। इसके बाद जब पैर जम जाएं तो दूसरे प्रमुख शहरों की तरफ रुख करें।
अब बात ऑफिस की। जब आप स्टार्टअप शुरू करने की प्लानिंग बना रहे हैं तो प्लानिंग में कंपनी का ऑफिस कहां होगा, यह भी होना चाहिए। यहां कुछ बातों को ध्यान में रखें:
– आपकी टीम ऑनलाइन काम करेगी या ऑफलाइन? इसी के आधार पर जगह की प्लानिंग करें।
– कंपनी का ऑफिस वहां हो जहां आपके कस्टमर हैं। अगर आप पूरे देश में कोई प्रोडक्ट या सर्विस लॉन्च कर रहे हैं तो ऑफिस ऐसी जगह रखें जहां कंपनी के लिए स्टाफ आसानी से आ सके और कंपनी के लिए प्रतिभाशाली लोग आसानी से मिल सकें।
– अगर फाउंडर या को-फाउंडर के पास कोई ऐसी अपनी जगह है जहां ऑफिस खोला जा सके तो उस जगह का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे किराए की रकम बचेगी।
– अगर अपनी जगह न हो तो आमतौर पर जगह नहीं खरीदी जाती, बल्कि किराए की जगह पर ही ऑफिस लिया जाता है। पर अगर रिटेल सेल है और दुकान चल जाए तो बाद में जगह का मालिक जगह खाली करने को कह सकता है। ऐसे में पहले दुकान मालिक से बात करें। हो सकता है कि वह किराया बढ़ाना चाहता हो। अगर ऐसा है कि देखें कि क्या किराया बढ़ाने के बाद आपके बिजनेस का लाभ बहुत ज्यादा तो कम नहीं हो जाएगा? अगर ऐसा होता है तो किराए की उस जगह को खाली कर दें। यहां ध्यान दें कि किराए पर ऐसी जगह लेते समय रेंट अग्रीमेंट जरूर बनवाएं। इसमें क्लीयर लिखवाएं कि अगर मालिक दुकान खाली करवाता है तो उसे कम से कम 2 महीने पहले बताना होगा। ऐसे में आपको 2 महीने मिल जाएंगे और आसपास ही आप दूसरी दुकान देख सकते हैं और उसके बारे में अपने ग्राहकों को बता सकते हैं।
मार्केटिंग की रणनीति
आपका काम सिर्फ स्टार्टअप शुरू करके प्रोडक्ट या सर्विस को मार्केट में लॉन्च करना ही नहीं होना चाहिए, बल्कि लोगों तक कैसे पहुंचे इसके बारे में भी प्लान करना चाहिए। यह काम मार्केटिंग एक्सपर्ट बेहतर तरीके से कर सकते हैं। अगर आपको मार्केटिंग करनी आती है तो अच्छी बात है, नहीं ताे मार्केटिंग एक्सपर्ट को अपनी टीम में शामिल करें। साथ ही सोशल मीडिया के जरिए भी अपने स्टार्टअप की मार्केटिंग करें ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक आपका प्रोडक्ट या सर्विस पहुंचे। इसके लिए लोगों के बीच में जाकर कैंपेन भी शुरू कर सकते हैं।
यहां कुछ बातें ध्यान रखें:
– अगर आपने ऐसी फील्ड में कदम रखा है जिसमें पहले से कोई और कंपनी है तो आपको मार्केटिंग के दौरान उनकी उस खास चीज को हाइलाइट करना होगा जिसमें आप दूसरी कंपनी से आगे हैं और लोगों को बेहतर सर्विस दे सकते हैं।
– मार्केटिंग के दौरान टेक्नॉलजी का जितना ज्यादा बेहतर तरीके से इस्तेमाल कर सकते हैं करें क्योंकि मार्केटिंग में आप टेक्नॉलजी के दम पर ही दूसरी कंपनी से आगे निकल सकते हैं।
कल की भी बनाएं योजना
अपने आइडिया को जमीन पर उतारते समय भविष्य की भी प्लानिंग करें। सिर्फ आज की जरूरतों को देखकर कोई भी प्लान न बनाएं। कई बार समय और जरूरत के आधार पर स्टार्टअप में बदलाव भी करने पड़ जाते हैं। जरा पहले लॉकडाउन के बारे में सोचें जब ई-कॉमर्स या फूड डिलिवरी कंपनियों ने दवाइयां और मेडिकल से जुड़ी दूसरी चीजें डिलिवर करना शुरू किया था। यही नहीं, किताबों की डिलिवरी से शुरू हुई फ्लिपकार्ट आज कई सामान समेत ग्रोसरी (किराने का सामान) और टू-वीलर्स भी बेचती है। यही नहीं, आप फ्लिपकार्ट से फ्लाइट की टिकट तक बुक करा सकते हैं। इसी प्रकार किसी को रकम भेजने के मकसद से शुरू हुई पेटीएम से अब डीटीएच और ओटीटी प्लैटफॉर्म को रिचार्ज कर सकते हैं। बिजली, पानी, ब्रॉडबैंड, क्रेडिट कार्ड का बिल, पीएनजी का बिल, इंश्योरेंस का प्रीमियम, लोन की ईएमआई, फास्टैग रिचार्ज, चालान, बच्चों के स्कूल की फीस आदि भी जमा कर सकते हैं। ये ऐसे उदाहरण हैं जिन्होंने समय के साथ खुद में बदलाव किए।
वहीं दूसरी ओर नोकिया को देखें। एक समय नोकिया के मोबाइल की दुनियाभर में धूम मची हुई थी। 10 में से 7-8 लोगों के पास नोकिया का ही फोन होता था। वह ऐसा दौर था जब स्मार्टफोन नहीं थे। समय बदला और साल 2007-08 में ऐंड्रॉइड ऑपरेटिंग सिस्टम (ओएस) वाले स्मार्टफोन मार्केट में आ गए। नोकिया ने ऐंड्रॉइड ओएस को अपनाने में खास दिलचस्पी नहीं दिखाई क्योंकि उसे लगता था कि उसके ग्राहक इसे पसंद नहीं करेंगे। यहीं नोकिया से गलती हो गई और नई टेक्नॉलजी न अपनाने के कारण वह लगभग पूरी तरह खत्म हो गई। कंपनी ने वापसी भी की लेकिन कामयाब नहीं हो पाई। इसलिए समय के साथ बदलने को तैयार रहें और इसके लिए भविष्य की प्लानिंग बनाएं। साथ ही अगर समय स्टार्टअप में बदलाव लाने पड़ें तो उसे दिल से और खुले दिमाग से स्वीकार करें। बदलाव के साथ कस्टमर का फीडबैक भी जरूर लें। अगर फिर से बदलाव करना पड़े तो करें।
व्यावसायिक योजना पर अड़े रहना कितना सही?
कई बार ऐसा भी होता है कोई शख्स समय के साथ बदलाव स्वीकार नहीं करता। उसे विश्वास होता है कि उसका आइडिया जबरदस्त है और वह एक न एक दिन जरूर हिट होगा। ऐसे में वह अपने समय का इंतजार करता है। यह कुछ मामलों में सही भी साबित होता है। स्टीव जॉब्स ऐसे ही लोगों में से एक थे। साल 2007 में फोन की मार्केट में नोकिया की हिस्सेदारी करीब 50 फीसदी थी। वहीं ऐपल की हिस्सेदारी मात्र 3.4% थी। समय आगे बढ़ा। साल 2011 में आईफोन का मार्केट शेयर बढ़कर करीब 16 फीसदी हो गया। वहीं नोकिया की हिस्सेदारी गिरकर करीब 16 फीसदी रह गई। इस समय तक मार्केट में ब्लैकबेरी फोन छा गए थे। लेकिन स्टीव जॉब्स अपने फोन की टेक्नॉलजी और ओएस (आईओएस ) पर ही अड़े रहे। स्टीव जॉब्स आईफोन के नए-नए मॉडल मार्केट में लाते रहे और एक बटन के दम पर आईफोन के फीचर्स का प्रचार करते रहे। आज नतीजा यह है कि मार्केट से ब्लैकबेरी और नोकिया खत्म हो गए हैं और आईफोन छाया हुआ है। ग्लोबल टेक्नॉलजी मार्केट रिसर्च फर्म ‘काउंटर पॉइंट’ की एक रिसर्च के मुताबिक साल 2022 के आखिरी तीन महीने में आई फोन 13 भारत में सबसे ज्यादा बिकने वाला स्मार्टफोन बन गया।
ऐसा ही दूसरा उदाहरण हम माइक्रोसॉफ्ट कंपनी का लेते हैं। इंटरनेट पर सर्च के लिए 90 फीसदी से ज्यादा लोग गूगल सर्च इंजन का इस्तेमाल करते हैं। गूगल के अलावा याहू और माइक्रोसॉफ्ट का बिंग सर्च इंजन भी है। लेकिन बिंग पर बहुत कम लोगों ने चीजें सर्च की होंगी। इसकी शुरुआत 2009 में हुई थी। काफी लोगों को लगने लगा था कि माइक्रोसॉफ्ट Bing को बंद कर देगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। एक रिपोर्ट के मुताबिक माइक्रोसॉफ्ट Bing को मजबूत बनाने और गूगल को टक्कर देने के लिए चैट जीपीटी का इस्तेमाल करेगा। इसके लिए माइक्रोसॉफ्ट बिंग का नया वर्जन लॉन्च करेगा। कहने का मतलब यह है कि अगर आपको अपने आइडिया पर पूरी तरह विश्वास है तो आप अपने अच्छे समय का इंतजार कर सकते हैं।
विफलता को लेकर अगली योजना के साथ तैयार रहें
जरूरी नहीं कि अगर आइडिया धांसू है तो वह 100 फीसदी सफल हो जाएगा। कई बार प्लानिंग गलत होने से स्टार्टअप भी खत्म हो जाता है। सोचिए, अगर आपका स्टार्टअप फेल हो जाए या आइडिया काम न करे तो क्या होगा?
हमेशा बैकअप प्लान बनाएं। इसके लिए इन बातों को नोट करके रखें:
– अगर स्टार्टअप विफल होता दिख रहा है तो इसका कारण जानेंगे।
– ग्राहकों के फीडबैक का हर हफ्ते आकलन करेंगे और जानेंगे कि ग्राहकों को प्रोडक्ट या सर्विस पसंद क्यों नहीं आ रही या आई?
– ग्राहकों के फीडबैक के आधार पर देखेंगे कि क्या आइडिया में बदलाव की जरूरत है?
कुछ बातें खुद से पूछें:
– मैंने जिस स्टार्टअप में कदम रखा, क्या मुझे उसका कुछ अनुभव था?
– मेरे को-फाउंडर और टीम के दूसरे साथियों में क्या वह अनुभव था जिसकी स्टार्टअप को चलाने के लिए जरूरत थी?
– क्या मैं अपना प्रोडक्ट या सर्विस टारगेट ग्रुप तक पहुंचाने में कामयाब रहा?
सारी बातों को जानने के बाद देखें कि गलतियां और कमियां रहीं? उन गलतियों और कमियों को सुधारें और नई तैयारी के साथ फिर से मार्केट में कदम रखें। आइडिया में बदलाव करना भी पड़े तो बेहिचक कर दें। इस दौरान याद रखें कि आप कुछ न कुछ अनुभव जरूर हासिल करेंगे। पुरानी गलतियों को दोहराने से बचें।
मैदान में उतरने से पहले करें नेट प्रैक्टिस
किसी भी स्टार्टअप के लिए जरूरी है कि अपने प्रोडक्ट या सर्विस की एमवीपी (मिनिमम वायाबल प्रोडक्ट) तैयार करें। एमवीपी का मतलब है कि कम से कम कीमत में सैंपल के तौर पर प्रोडक्ट या सर्विस का वर्जन तैयार करना ताकि लोगों के फीडबैक के आधार पर प्रोडक्ट या सर्विस में सुधार किया जा सके। यह ठीक उसी प्रकार है जैसे जब कोई ऐप शुरू होता है तो पहले कुछ यूजर्स के लिए उसका बीटा वर्जन लॉन्च किया जाता है। उसने मिले फीडबैक के आधार पर उसमें सुधार करके बाकी यूजर्स के लिए ऐप को लॉन्च किया जाता है।
मान लीजिए कि आपका स्टार्टअप फ्लेवर्ड चिप्स से जुड़ा है। बड़े लेवल पर चिप्स को तैयार करने में बड़ी-बड़ी मशीनें और काफी लोगों की जरूरत होगी। ऐसे में सैंपल के तौर पर फ्लेवर्ड चिप्स के कुछ पैकेट कम से कम संसाधनों और कीमत में तैयार करके लोगों के बीच में लाएं और उन्हें टेस्ट कराएं। यही एमवीपी है। लोगों से मिले फीडबैक के आधार पर उसमें सुधार करें और उसे पीएमएफ (प्रोडक्ट मार्केट फिट) तक लाएं। पीएमएफ यानी वह प्रोडक्ट या सर्विस मार्केट में आने के लिए तैयार है।
अगर आपका ऑर्गेनिक सब्जी या फलों से जुड़ा स्टार्टअप है तो आप एक वॉट्सऐप नंबर देकर कुछ लोगों को फ्री में सब्जियां और फल दे सकते हैं और उनका फीडबैक लें। ऐसे में एमवीपी आपका वॉट्सऐप नंबर हो जाएगा। इसी प्रकार कोई सर्वे या फॉर्म या वोटिंग के जरिए भी अपने प्रोडक्ट या सर्विस का फीडबैक ले सकते हैं। यह भी एमवीपी का हिस्सा हैं।

अब एक उदाहरण से चीजों को समझते हैं
मान लीजिए, आपको फ्लेवर्ड चिप्स बनाने का आइडिया आया। कुछ लोगों से इस बारे में बात की और राय ली। काफी रायशुमारी के बाद आपने आइडिया को स्टार्टअप के रूप में लॉन्च करने का प्लान बना लिया। अब आपको इन क्षेत्रों में काम करने की जरूरत पड़ेगी:
– सबसे पहले खुद से यह पूछे कि क्या मुझे चिप्स बनाना आता है? क्या मुझे यह पता है कि इसके लिए कौन कौन-सी मशीनें इस्तेमाल होती हैं और कहां से मिलती हैं? इसके लिए रजिस्ट्रेशन आदि की प्रक्रिया क्या है? आदि। अगर आपको इस फील्ड के बारे में कुछ नहीं पता तो बेहतर होगा कि पहले कुछ जानकारी ले लें। इसके लिए यू-ट्यूब की मदद लें या मार्केट रिसर्च करें।
– जानकारी इकट्ठी करने के बाद अब प्लान बनाएं कि फ्लेवर्ड चिप्स किसे बेचेंगे यानी आपका टारगेट ग्रुप कौन होगा? मान लीजिए कि आपका टारगेट ग्रुप बच्चे और युवा हैं।
– अब यह तय करें कि चिप्स कहां बेचेंगे? शुरुआत कहां से करेंगे? किसी एक शहर से या राज्य से या पूरे देश में एक साथ? मान लीजिए, आप दिल्ली में रहते हैं और शुरुआत भी दिल्ली से करना चाहते हैं।
– इसके बाद यह देखें कि आप अपना जो स्टार्टअप शुरू करने जा रहे हैं, उसमें आप खुद किस चीज में निपुण हैं यानी क्या आपको मार्केटिंग आती है? क्या आपके पास इन्वेस्ट करने के लिए रकम है? क्या आपको सेल्स की नॉलेज है?
– अब तय करें कि आपकी टीम में कितने लोग होंगे? इसमें को-फाउंडर या किसी दूसरे पार्टनर से लेकर वितरण में लगने वाले कर्मचारी तक शामिल करें। जिस फील्ड में आप माहिर हैं, उसे छोड़कर स्टार्टअप में जरूरी दूसरे फील्ड के लोगों को भर्ती करने का प्लान बनाएं।
– किस शख्स की कितनी तनख्वाह होनी चाहिए, इसे तय करें। अगर सैलरी तय करने में परेशानी आए तो इसके लिए timesjobs.com, naukri.com आदि वेबसाइट की मदद लें।
– अब देखें कि चिप्स बनाने में जिन-जिन मशीनों का इस्तेमाल होता है, वे कहां से और कितने की मिलेंगी? इसके लिए indiamart.com जैसी वेबसाइट का इस्तेमाल करें।
– इसके बाद फ्लेवर्ड चिप्स बनाने में आने वाले खर्च का अनुमान लगाइए। इसके बारे में किसी ऐसे शख्स से जानकारी लें जो इस फील्ड में पहले से हो। ऐसे शख्स को सोशल मीडिया (फेसबुक, इंस्टाग्राम, लिंक्डइन आदि) के जरिए तलाश सकते हैं। खर्च को दो तरह से बांटें। पहला- एक साथ होने वाला खर्च, जैसे- मशीनों की खरीद आदि। दूसरा- हर महीने होने वाला खर्च, जैसे- सैलरी, बिजली का बिल आदि। इस तरह से सालभर का अनुमानित खर्च जोड़ें। हर महीने या साल में एक बार होने वाले खर्च (सोशल मार्केटिंग, ऑनलाइन एडवर्टाइजमेंट आदि) को पूरे 3 साल के लिए जोड़ें और कुल सारे खर्च एक साथ जोड़ लें।
– अब देखें कि 3 साल का जो अनुमानित खर्च है, क्या उतनी रकम आपके पास है? अगर नहीं है या कुछ कम है तो इसका इंतजाम कहां से और कैसे होगा?
– अब एमवीपी तैयार करें और फीडबैक के आधार पर पीएमएफ पर आएं।
– सारी चीजों का इंतजाम होने के बाद चिप्स का प्रोडक्शन शुरू करें और ट्रायल के तौर पर दिल्ली में जगह-जगह स्टॉल लगाएं और बच्चों को फ्री में चिप्स का एक-एक पैकेट दें। यह आपके प्रोडक्ट को लोगों तक पहुंचाने का एक तरीका है।
– इस दौरान अपने उत्पाद के छोटे-छोटे (अधिकतम 1 मिनट) के विडियो बनाएं और यू-ट्यूब चैनल बनाकर उसपर अपलोड करें। इन वीडियो को सोशल मीडिया के जरिए लोगों पर पहुंचाएं।
– आपके चिप्स देशभर में ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे इसके लिए अपने प्रोडक्ट को ऐमजॉन, फ्लिपकार्ट आदि पर लिस्ट करें। साथ ही Blinkit और Zepto जैसे फ्लैटफॉर्म से भी बात करके अपने प्रोडक्ट वहां रखें। विशाल मेगा मार्ट, रिलायंस मार्ट आदि जैसे स्टोर में भी अपने प्रोडक्ट रखें। यह सब इसलिए ताकि आपकी चिप्स कम दाम में ज्यादा से ज्यादा लोगों तक सीधे पहुंचे। आप चाहें तो फ्रेंचाइजी भी दे सकते हैं। जब कुछ रकम आनी शुरू हो जाए तो डिस्ट्रिब्यूटरशिप भी दे सकते हैं ताकि चिप्स हर दुकान पर भी नजर आए।
– दुकान पर आपके चिप्स लोगों को नजर आए, इसके लिए दुकानदार को कुछ कूपन या प्राइज ऑफर करें ताकि वह आपके चिप्स दूसरी कंपनियों के चिप्स के आगे लगा सके।
– हर महीने रिसर्च करें कि आपके चिप्स कहां ज्यादा बिके? इसके आधार पर एक रिपोर्ट तैयार करें और फिर ऐसी जगह ज्यादा फोकस करें जहां बिक्री ज्यादा हो सकती है।
– इस प्रकार आप अपने उत्पादो को अपने टारगेट ग्रुप तक पहुंचा सकते हैं।
(यह सिर्फ एक उदाहरण है। हो सकता है कि कोई मार्केटिंग एक्सपर्ट आपके प्रोडक्ट या सर्विस को ग्राहक तक पहुंचाने में कोई दूसरी तरीका बताए।)
इनकी लें मदद
किताबें
स्टार्टअप शुरू करने को लेकर काफी जानकारी आप किताबों से भी ले सकते हैं। कुछ किताबें ये हैं- स्टार्टअप गाइड, टेक ऑफ आपके स्टार्टअप की उड़ान, जीरो टू वन आदि।
यू-ट्यूब चैनल
यू-ट्यूब पर कई वीडियो हैं। कुछ इस प्रकार हैं:
1. विडियो का नाम: स्टार्टअप बिज़नस शुरू करना चाहते हैं तो इस आसान सी प्रक्रिया को अपनाएं
चैनल: Business Ideas (@businessideas5737)
2. वीडियो का नाम: How to build a Startup? | How to find a Co-founder & Hire Employees?
चैनल: Aman Dhattarwal (@AmanDhattarwal)
3. वीडियो का नाम: How to convert your IDEAS into ACTION?
चैनल: Simerjeet Singh (@SimerjeetSingh)
बिजनेस का ‘मार्ग’
स्टार्टअप के बारे में और अधिक जानकारी के लिए केंद्र सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग की वेबसाइट maarg.startupindia.gov.in पर जा सकते हैं। सोमवार को इस वेबसाइट का औपचारिक उद्घाटन होगा।

 

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