स्त्री शिक्षा की राह खोलने वाली भारत की पहली शिक्षिका सावित्री बाई फुले

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आज अगर बात शिक्षा के क्षेत्र की हो तो महिला शिक्षिकाओं के बिना शिक्षण संस्थानों की कल्पना करना कठिन है लेकिन एक समय ऐसा भी रहा जब स्त्रियाँ शिक्षा पाने के अधिकार से वंचित थीं। हालाँकि आज भी स्थिति पूरी तरह बदली नहीं है मगर स्थिति पहले की तुलना में बेहतर बहुत हुई है। ऐसे समय में जब स्त्रियों के लिए शिक्षा प्राप्त करना ही बड़ी चुनौती हो, वहाँ पर किसी महिला के शिक्षिका होने की कल्पना भी कठिन लगती है। ऐसी स्थिति में एक महिला ने संघर्ष किया और इस संघर्ष में अपने पति के सहयोग से उन्होंने स्कूल चलाया, लोग उनके इस दुस्साहस पर ताने फेंकते और स्कूल जाते हुए उन पर गोबर फेंकते मगर उन्होंने स्त्री शिक्षा का यज्ञ आरम्भ किया, उसी यज्ञ का प्रतिफलन है कि आज लड़कियाँ पढ़ भी रही हैं और पढ़ा भी रही हैं। शिक्षा की मशाल से समाज को आलोकित करने वाली यह महिला थीं सावित्री बाई फुले जो भारत की पहली शिक्षिका एवं प्रधानाध्यापिका हैं।
3 जनवरी 1831 को सावित्रीबाई फुले का जन्म हुआ था। समाज सुधारक और कवयित्री भी थीं सावित्री बाई, पति ज्योतिबा फुले के प्रोत्साहन से वे बाधाओं की परवाह किये बगैर निरन्तर आगे बढ़ती रहीं। उनको आधुनिक मराठी कविता की अग्रदूत भी कहा जाता है। 1852 में उन्होंने लड़कियों के लिए स्कूल खोला था। सावित्रीबाई के पिता का नाम खन्दोजी और माता का नाम लक्ष्मी थी। उनका विवाह 1840 में ज्योतिबा फुले से हुआ था। पहले ज्योतिबा को ज्योति राव के नाम से जाना जाता था। वे सावित्रीबाई के संरक्षक और गुरु के साथ मार्गदर्शक भी थे।
सावित्रीबाई ने अपने जीवन को एक मिशन की तरह से जीया जिसका उद्देश्य था विधवा विवाह करवाना, छुआछूत मिटाना, महिलाओं की मुक्ति और दलित महिलाओं को शिक्षित बनाना था। जब वो स्कूलों में पढ़ाने जाती थीं, तो लोग रास्ते में उन पर कीचड़ और गोबर फेंका करते थे, इसलिए सावित्रीबाई अपने थैले में दूसरी साड़ी लेकर चलती थी और स्कूल में बदल लिया करती थीं। सन 1854 में उनकी पहली पुस्तक ‘काव्य फुले’ प्रकाशित हुई थी। इसके अलावा सावित्रीबाई ने कई कविताओं और भाषणों से वंचित समाज को जगाया, लेकिन अभी भी उनकी कहानी देश की 70 प्रतिशत से ज़्यादा आबादी से दूर है।
24 सितंबर 1873 को ज्योतिराव फुले ने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की, जो दहेज मुक्त और बिना पंडित पुजारियों के विवाह संपन्न कराती थी। सावित्रीबाई इस संस्था की एक सक्रिय कार्यकर्ता बनी। बाद में सावित्रीबाई ने अपने दत्तक पुत्र यशवंत का इसी संस्था के तहत पहला अंतरजातीय विवाह करवाया। भारतीय डाक ने 10 मार्च 1998 को सावित्रीबाई के सम्मान के रूप में डाक टिकट जारी किया। साल 2015 में पुणे विश्वविद्यालय का नाम सावित्रीबाई फुले विश्वविद्यालय किया गया। 3 जनवरी 2017 को गूगल ने सावित्रीबाई फुले के 186वीं जयंती पर अपना ‘गूगल डूडल’ बनाया।
28 नवंबर 1890 को अपने पति ज्योतिबा फुले के मरने के बाद, सावित्रीबाई लगातार उनके अधूरे समाज सुधार के कार्यों में लगी रहीं. 1896 में पुणे में आए भीषण अकाल में इस क्रांतिकारी महिला ने पीड़ितों की काफी सहायता की।
इसके साल भर बाद ही पूरा पुणे प्लेग की चपेट में आ गया, जिसमें सैकड़ों बच्चे मर रहे थे। सावित्रीबाई ने बेटे यशवंत को बुलाकर एक अस्पताल खुलवाया, जिसमें वह ख़ुद दिन- रात मरीजों की देखभाल करने लगीं। 10 मार्च 1897 को सावित्रीबाई ख़ुद इस संक्रामक बीमारी की चपेट में आकर उनका निधन हुआ।
( स्त्रोत साभार – न्यूज नेशन्स)

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