स्त्री हो या पुरुष दोनों के के कंधों पर बराबर- बराबर होना चाहिए श्रम का भार

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प्रो. गीता दूबे

ऐ सखी सुन  – भाग 8

सभी सखियों को मेरा नमस्कार। उम्मीद है सखियों कि आप सब कुशलतापूर्वक होंगी। सखियों, सर्दी का मौसम आ गया है और इस मौसम में खुद को ही नहीं पूरे परिवार को बचा कर रखने की जिम्मेदारी हम स्त्रियों के कंधों पर ही होती है इसलिए सर्दी के मौसम में बरती जाने वाली तमाम सावधानियों को बरतते हुए आप सब कुशलतापूर्वक अपने परिवार के साथ मौसम का आनंद उठाएँ।

सखियों सर्दी ही नहीं हर मौसम में स्त्रियों की अलग-अलग जिम्मेदारियाँ होती हैं। जिस तरह देश का किसान सर्दी-गर्मी, जाड़ा -बरसात हर मौसम का डटकर मुकाबला करते हुए अपनी खेती किसानी के काम में लगा रहता है ताकि देश भर के लोगों के मुँह तक निवाला और पेट तक पुष्टिकर भोजन पहुँच सके। या हमारे सैनिक देश की सीमा की सुरक्षा में प्राणपण से तैनात रहते हैं तकि देश के नागरिक अपने- अपने घरों में सुख चैन की साँस और नींद ले सकें। सखियों, वही काम घरेलू मोर्चे पर स्त्रियाँ करती हैं। मौसम कोई भी हो और स्त्री किसी भी श्रेणी की क्यों ना हो, संपन्न घर की या फिर हाशिए के उस पार की। कामकाजी हो या घरेलू, तपती गर्मी में जिस तरह पसीने से तरबतर होती हुई भी वह सबके लिए रोटी -पानी के इंतजाम में लगी रहती है, यह निश्चित तौर पर एक महत्वपूर्ण काम है। उसी तरह उन गाँवों में जहाँ अभी तक गैस के चूल्हे सुविधा नहीं पहुँच पाई है, बरसात के मौसम में सीली हुई लकड़ियों को सुलगाने की कोशिश में आँखों से आँसू बहाती हुई भी सब को भोजन मुहैया कराने में दत्तचित्त रहती है। ऐ सखी सुन, मुझे ही नहीं बहुत से लोगों का यह मानना है कि स्त्रियाँ ना हों या फिर वह अपने काम पर मुस्तैद ना हों तो समाज की स्थिति न जाने क्या होगी। राजस्थान के उन तमाम गाँवों में जहाँ घर पर पानी की सुविधा नहीं होती है, जल लाने ने के लिए कड़ी धूप में स्त्रियाँ बहुत दूर तक जाती हैं और सर पर मटके पर मटका धर घर लौट कर आती हैं ताकि घर के लोगों की प्यास बुझ सके तथा उनकी अन्य जरूरतें पूरी हो सकें। उसी तरह भरी बरसात और हाड़ गलानेवाली ठंड में भी उन्हें यही प्रक्रिया दोहरानी पड़ती है। लेकिन इसके बावजूद समाज स्त्रियों के प्रति न जाने क्यों इतना नाशुक्रा या असहिष्णु होता है कि उन्हें उनके इस अनवरत श्रम के लिए अनथक परिश्रम के लिए धन्यवाद ज्ञापन करना तो दूर की बात है उनके काम की जरा कद्र तक नहीं करता। बल्कि कई बार तो घरेलू स्त्रियों को यह भी सुनने को मिलता है कि ‘करती क्या हो, दिन भर ?  चावल उबाल कर रख देती हो या  रोटियाँ थाप देती हो, इसके अलावा सारे दिन पड़ी-पड़ी सोती रहती हो या सहेलियों से गपशप करती हो।’ आज के संदर्भ में कहना हो तो कहा जाएगा कि ‘दिन भर पड़ी पड़ी टीवी सीरियल देखती हो।’ और अगर स्त्री कामकाजी हो जो घर और बाहर दोनों मोर्चों पर जो जूझती हो उसे यह कहा जाता है ‘सज संवर कर निकल जाती हो, सारा दिन बाहर बिताकर लौट आती हो। कभी क्या परिवार वालों की इच्छा और फरमाइशों का ध्यान करती हो ? हुंह रहने भी दो..अपनी ही दुनिया में मगन रहती हो।’ सखियों, हमारे समाज की यह रवायत है कि उन्हीं पर असहनीय अत्याचार किया जाता  है जो इसे सहते हैं। लेकिन सहने की भी एक सीमा होती है। सहते -सहते कभी न कभी जब सहनशीलता का बाँध टूट जाता है और स्त्री प्रतिकार करने की स्थिति में आती है, अपने ही परिवार जनों के अत्याचारों के विरोध में मुखर होती है, आवाज उठाती है तो उसे अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता। उसकी आलोचना की जाती है और ऐसी स्त्रियों को समाज के लिए खतरा माना जाता है क्योंकि मान लिया जाता है कि आज वह अपना घर तोड़ रही है तो कल दूसरी स्त्रियों को भी इसके लिए उत्साहित करेगी या फिर दूसरे शब्दों में कहें तो यह खुद तो बिगड़ी ही है इसके बाद पूरे समाज को बिगाड़ने पर तुल जाएगी।

सुनो सखियों, कई बार मुझे यह भी लगता है यह समाज ऐसा इसलिए कर पाता है क्योंकि स्त्रियाँ आपस में संगठित नहीं होतीं या फिर उनके बीच जो स्नेह और सौहार्द होना चाहिए उसके पनपने के रास्ते में कई बार पुरूषतांत्रिकसमाज बाधक सिद्ध होता है। शायद इसलिए कि जब तक वह एक दूसरे के खिलाफ होंगी या आपस में लड़ती रहेंगी तब तक सामाजिक बेड़ियों को तोड़ने की दिशा में कदम नहीं बढ़ा पाएंगी। तो लब्बोलुआब यह है सखियों कि जब तक स्त्रियां संगठित होकर साहस के साथ अपने दुख तकलीफ को बयान करना नहीं शुरू करेंगी, परिवार के सामने सहयोग की मांग नहीं रखेंगी तब तक परिवार को उनकी अहमियत का अहसास भी नहीं होगा और वह उनकी मांगों को स्वीकार भी नहीं करेगा। जब तक परिवार हो या समाज, श्रम विभाजन के नियमों को स्वीकार नहीं करेगा तब तक हम समाज को स्वस्थ और सुंदर समाज नहीं मान सकते।  स्त्री हो या पुरुष श्रम का भार दोनों के के कंधों पर बराबर- बराबर होना चाहिए। ऐसा नहीं हो कि एक व्यक्ति तो मेहनत कर कर के मर जाए और दूसरा आराम से पाँव पर पाँव धरे मेहनत के सुस्वादु फल को ग्रहण करके मेहनत करनेवाले पर अहसान करें। सखियों, कई बार स्त्रियों की अपनी मानसिक बुनावट भी उनकी दशा के लिए जिम्मेदार होती है। उन्हें जन्म के साथ घुट्टी में ही ज्ञान का यह घूँट पिलाया जाता है कि उनका काम है, दूसरों की सेवा करना दूसरों से सेवा लेना नहीं। लेकिन यहाँ सवाल सेवा करने या करवाने का नहीं है, श्रम के विभाजन का है और जब तक स्त्री स्वयं अपने अतिरिक्त भार की शिकायत करते हुए उसे कम करने की मांग को सामने नहीं रखेगी तब तक परिवार के अन्य सदस्य उसकी पीड़ा को बाँटने और उसे कम करने की कोशिश नहीं करेंगे। सखियों, इसकी शुरुआत स्त्री को अपने बच्चों को उचित शिक्षा देकर भी करनी होगी, स्वयं अपने बेटे और बेटी के बीच कोई विभाजन न करके। सभी बच्चों को न केवल समान सुविधाएँ मिलनी चाहिएँ बल्कि उन पर समान जिम्मेदारियाँ भी डालनी चाहिए ताकि ये बच्चे बड़े होकर स्वयं स्वस्थ समाज के निर्माण में सहायक सिद्ध हों। फिलहाल विदा सखियों। अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी।

1 COMMENT

  1. सखी, पूरे साल हर मौसम में रोज़मर्रा के सैंकड़ों काम-काज करती हर तरह की स्त्रियों के दोयम दर्ज़े की स्थिति को अत्यंत संवेदनशील सोच के साथ अपने छोटे आलेख में उजागर किया है। वे चाहे गाँव की हों या शहर की, कामकाजी हों सा घरेलू पहाड़ की हों या समतल मैदानी क्षेत्र की घर के सारे काम, बच्चों से लेकर बूढ़ों तक की देखभाल का भार उसी पर होता है। पहाड़ों पर तो जंगल से लकड़ी काट कर, माथे पर लाद कर जलावन तक औरतें लाती हैं।
    यही श्रम अगर स्री-पुरुष के बीच बराबर-बराबर बँटा होता तो तो काम भार नहीं लगता। सखी, बराबरी की इस संस्कृति के संसाकार परिवार में बचपन से ही बच्चों को घूँटी में पिलाए जाएँ, तभी बदलेगा हमारा समाज।
    स्त्री की परेशानियों और समस्याओं पर उनके निदान की चर्चा की ज़रूरत को समझा और साझा किया, इसके लिए धन्यवाद शब्द छोटा है। हाँ अपनी बात यूँ ही साझा करती रहो, कही कुछ तो बदलने की उम्मीद बनी रहेगी।टिप्पणी

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