स्वतंत्रता की अवधारणा और प्रेमचंद पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

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कोलकाता : भारतीय भाषा परिषद द्वारा ‘स्वतंत्रता की अवधारणा और प्रेमचंद’ विषय पर एक राष्ट्रीय वेब-संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी में देश के अलग अलग हिस्सों से कई विद्वानों ने हिस्सा लिया। इग्नू के पूर्व प्रोफेसर डॉ.जवरीमल्ल पारख ने कहा कि प्रेमचंद सामाजिक और राजनीतिक आजादी को स्वतंत्रता की अवधारणा का अर्थ मानते थे। खिदिरपुर कॉलेज की प्रोफेसर इतु सिंह ने प्रेमचंद की रचनाओं में आए स्वराज के प्रश्नों को उठाते प्रेमचंद की ‘कर्बला’ की चर्चा की। बीएचयू के पूर्व प्रोफेसर अवधेश प्रधान ने कहा कि प्रेमचंद केवल राजनीतिक स्वाधीनता नहीं बल्कि एक मुकम्मल स्वाधीनता की बात करते थे। प्रेमचंद की राष्ट्रीय चेतना यह बताती है कि हमारे देश को एक ऐसी आजादी की ओर ले जाना है जहां उसके सांस्कृतिक पक्ष का भी सम्मान सुरक्षित रहे। बीएचयू के सहायक प्रोफेसर विवेक सिंह ने कहा कि प्रेमचंद की रचनाओं में जो स्वप्नदर्शी पात्र थे और वे देश के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगाने को तैयार थे ।आज हमें ऐसे चरित्र बहुत मुश्किल से मिलेंगे। मॉरीशस से जुड़े प्रो.वेदरमण ने कहा कि प्रेमचंद से बेहतर कौन जान सकता था कि आर्थिक आजादी क्या होती है। प्रेमचंद शिक्षा व्यवस्था को लेकर हमेशा दुखी रहते थे।वे आजादी का रास्ता शिक्षा से जोड़कर देखते हैं। वे देश की मुक्ति के साथ-साथ मनुष्य की मुक्ति का भी सपने देखते हैं। इस अवसर पर स्वागत और विषय प्रस्तुति करते हुए प्रसिद्ध लेखिका डॉ.कुसुम खेमानी ने प्रेमचंद की कई रचनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रेमचंद ने कैसे गांधी की पुकार पर नौकरी छोड़कर आजादी की लड़ाई में साथ दिया।वे निर्भय और स्वतंत्रता के पक्षधर थे।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो.शंभुनाथ ने कहा आज भारतीय जनता इस कोरोना काल में आजादी की 75 वीं वर्षगांठ की ओर बड़ी उम्मीद से देख रही है। प्रेमचंद का साहित्य एक सबक है जिसमें आने वाले समय के साथ एक गहरा संबंध है। उन्होंने चर्चिल के कथन ‘भारत में हवाओं के अलावा कुछ भी स्वाधीन नहीं रह जाएगा’ का उल्लेख करते हुए प्रेमचंद के विचारों की चर्चा की।
कार्यक्रम का संयोजन और संचालन संजय जायसवाल और पूजा गुप्ता ने तथा धन्यवाद ज्ञापन संस्था के सचिव डॉ. केयूर मजमूदार ने दिया।

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