हमेशा से सभी का प्रिय रहा है बिहार की पहचान लिट्टी – चोखा

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लिट्टी – चोखा, आज इसे अगर सुपर इन्स्टेंट फूड कहा जाए तो गलत नहीं होगा। बड़ी हस्तियाँ इसे चाव से खाती रही हैं और इसे बिहार की पहचान भी माना जाता है, पर यह लिट्टी – चोखा…आया कहाँ से, इस पर शायद ही हमने सोचा हो…आज हम इस पर ही बात करेंगे –
लिट्टी चोखा मूलत: बिहार का व्यंजन है. हालांकि इसे झारखंड और पूर्वी उत्तर में भी खाया जाता है. लिट्टी बनाने में सत्तू और आटे का प्रयोग किया जाता है. इसके साथ टमाटर की चटनी और आलू और बैंगन का चोखा भी खाया जाता. ठंड के दौरान इसका उपयोग और भी बढ़ जाता है..
विश्वामित्र ने भगवान राम के साथ खाया था लिट्टी-चोखा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार लिट्टी चोखा त्रेतायुग के समय से ही बिहार में खाया जाता था। महर्षि विश्वामित्र ने पंचकोसी यात्रा के दौरान राम-लक्ष्मण के साथ चरित्रवन( अभी बक्सर) में लिट्टी-चोखा खाया था। यह परम्परा आज भी बक्सर में पंचकोसी मेले के दौरान निभाई जाती है।
मगध काल में प्रसार बढ़ा
लिट्टी चोखा का प्रचार प्रसार मगध काल में तेजी से बढ़ा.हालांकि इतिहास में यह लिखित रूप से कहीं दर्ज नहीं मिलता है कि लिट्टी-चोखा का विस्तार कैसे हुआ। ग्रीक यात्री मेगास्थनीज जब 302 ईसापूर्व में पाटलीपुत्र आया था तो वो वहां की भव्यता देखकर हैरान रह गया था. मेगास्थनीज ने लिखा था कि इस भव्य शहर में 64 गेट, 570 टावर और कई बाग-बगीचे हैं. यहां महलों और मंदिरों की भरमार है। मेगास्थनीज ने लिखा था- मैंने पूरब के एक भव्य शहर को देखा है। मैंने पर्सियन महलों को भी देखा है लेकिन ये शहर दुनिया का सबसे विशाल शहर है। मगध साम्राज्य के उसी बेहतरीन दौर में लिट्टी चोखा सबसे पहली बार अस्तित्व में आया।
अंग्रेज काल में चोखा का स्थान मटन ने ले लिया
1757 के बाद भारत में अंग्रेजों का वर्चस्व बढ़ने लगा। इसी के साथ ही लिट्टी चोखा में नये प्रयोग भी होने लगे। अंग्रेजों ने लिट्टी-चोखा साथ मटन का प्रयोग शुरू किया. आज भी बड़े-बड़े कार्यक्रमों में लिट्टी-मटन बड़े चाव से खाया जाता है। लिट्टी चोखा को युद्ध का खाना भी कहा जाता है। प्राचीन काल से युद्ध के दौरान सैनिक खाने के सामान के तौर पर लिट्टी लेकर चलते थे। लिट्टी की खासियत है कि ये जल्दी खराब नहीं होती। इसे बनाना भी आसान है और ये काफी पौष्टिक भी होता है। 1857 के विद्रोह में सैनिकों के लिट्टी चोखा खाने का जिक्र मिलता है। तात्या टोपे और रानी लक्ष्मी बाई ने इसे अपने सैनिकों के खाने के तौर पर चुना था। इसे फूड फॉर सरवाइवल कहा गया. उस दौर में ये अपनी खासियत की वजह से युद्धभूमि प्रचलन में आया. इसे बनाने के लिए किसी बर्तन की जरूरत नहीं है। इसमें पानी भी कम लगता है और ये सुपाच्य और पौष्टिक भी है। सैनिकों को इससे लड़ने की ताकत मिलती थी। इसके साथ ही अप्रवासी श्रमिक भी जहाँ गये, लिट्टी वहाँ पहुँचती रही। ये जल्दी खराब भी नहीं होती।
कैसे बनता है लिट्टी-चोखा
लिट्टी-चोखा बनाने के लिए गोयठा(उपले) वाली आग सबसे उपयुक्त माना जाती है। इसमें लिट्टी यानी आटे की लोई में मसालेदार सत्तू को भरा जाता है, फिर उसे इस आग में सेंका जाता है। साथ ही बैंगन और टमाटर को भी आग में सेंका जाता है। फिर चोखा के लिए बैगन, टमाटर और हरी मिर्च का प्रयोग किया जाता है। समय के साथ लिट्टी बनाने के तरीके में काफी परिवर्तन आ जा चुका है लेकिन नहीं बदला तो इसका स्वाद और इसके प्रति लोगों की दीवानगी।
बिहार की पहचान है लिट्टी-चोखा
लिट्टी चोखा को बिहार का व्यंजन माना जाता है। बिहार के लोग ही नहीं बल्कि देसी और विदेशी भी इस व्यंजन को बड़े चाव से खाते हैं। बिहार के लोगों ने इसे दूसरे राज्यों में भी फैलाया है। आज लिट्टी चोखा के स्टॉल हर शहर में दिख जाते हैं। लिट्टी चोखा खाने में स्वादिष्ट तो होता ही है, ये सेहत के लिए भी फायेदमंद है।
गेहूं के आटे में सत्तू को भरकर इसे आग पर पकाया जाता है. फिर देसी घी में डुबोकर इसे खाया जाता है। जिन्हें कैलोरी की फिक्र है, वो बिना घी में डुबोये लिट्टी का स्वाद ले सकते हैं। तला-भुना नहीं होने की वजह से ये सेहत के लिए अच्छा है। इसके साथ बैंगन, आलू – टमाटर का चोखा खाया जाता है। बैंगन को आग में पकाकर उसमें टमाटर, मिर्च और मसाले को डालकर चोखा तैयार किया जाता है। आलू भी आग पर पकाकर या फिर उसे उबालकर चोखा बनाया जाता है। टमाटर भी आग में पकाकर ही बनाया जाता है। बहुत से लोग परवल का चोखा भी बनाते हैं। बगैर सत्तू डाले जो लिट्टी बनती है, वह डोंगी के आकार की होती है, तो बहुत से लोग उसे गोलाकार भी देते हैं। इसे खखड़ी कहा जाता है। चोखा और सत्तू, दोनों के लिए ही सरसो तेल ही इस्तेमाल किया जाता है। बहुत से लोग बासी लिट्टी ऐसे ही खाते हैं या फिर चाय के साथ नाश्ते की तरह खाते हैं। वहीं, लिट्टी को छान भी लिया जाता है यानी फ्राइड लिट्टी भी बनती है जो सफर के दौरान काम आती है क्योंकि यह कई दिनों तक खराब नहीं होती। बिहार का ये व्यंजन राजस्थान के बाटी-चूरमा की तरह है. बिहार में ये खासा लोकप्रिय है. इसे बनाना भी आसान है और ये पौष्टिक भी है।

(स्त्रोत साभार – न्यूज 18 तथा प्रभात खबर)

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