हस्तशिल्प ही नहीं, अब लीजिए बांस का स्वाद…खाइए बांस का अचार एवं नूडल्स

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पालमपुर : बांस का नाम सुनते ही कुछ चीजें ध्यान में आती हैं। पहला पशुओं के लिए बांस का चारा, दूसरा इसकी लकड़ी से तैयार होने वाली टोकरियां व ग्रामीण क्षेत्र में मिट्टी के मकानों में बनने वाली छत। कम ही लोग जानते हैं कि बांस अब खाने की थाली में भी शामिल हो रहा है। बांस का अचार तो बनता था, अब इससे बने नूडल्स, कैंडी और पापड़ का भी जायका ले सकते हैं। हिमालय जैव संपदा प्रौद्योगिकी संस्थान (आइएचबीटी) पालमपुर ने बांस से खाद्य पदार्थ भी तैयार किए हैं। ये पदार्थ स्वादिष्ट तो हैं ही, इनमें प्रोटीन, कैल्शियम व फाइबर भी मिलते हैं।
खाद्य पदार्थों के अलावा विज्ञानियों ने बांस का कोयला भी तैयार किया है। यह कोयला जल्दी जलता है। इससे ऊर्जा व लकड़ी के संरक्षण में भी मदद मिलेगी। संस्थान में बांस की मदद से धागा बनाने का कार्य चल रहा है। यह कार्य लगभग अंतिम चरण में है।
आइएचबीटी कई वर्ष से बांस पर शोध कर रहा है। बांस की कई प्रजातियां तैयार करने के लिए मशहूर इस संस्थान में 10 वर्ष पहले बांस का संग्रहालय बना था। इसमें दरवाजे, खिड़कियां, फर्श और छत सब बांस का है। यह आज भी वैसा ही लगता है जैसे शुरुआती दौर में था। इसे हाउस आफ बैंबू कहते हैं। विज्ञानियों के अनुसार बांस की मदद से कपड़ा, लकड़ी की टाइल, शैंपू, प्लाई बोर्ड सहित कई पदार्थ तैयार किए जा सकते हैं। इस दिशा में कई देशों में कार्य हो भी चुका है।
नूडल्स, बडिय़ों और पापड़ में बांस का 35 प्रतिशत फाइबर
आइएचबीटी में तैयार खाद्य पदार्थों में नूडल्स बनाने में करीब 35 प्रतिशत बांस के फाइबर व आटे का प्रयोग किया गया है। बडिय़ों व पापड़ में भी करीब 35 प्रतिशत बांस के फाइबर का प्रयोग हुआ है। कैंडी पूरी तरह बांस से बनाई गई है। फाइबर से शरीर स्वस्थ रहता है।
हिमाचल में बांटे 50 हजार पौधे
आइएचबीटी ने राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत अब तक हिमाचल में करीब 50 हजार पौधे किसानों को वितरित किए हैं। संस्थान में बांस की कुल 40 प्रजातियां हैं। इनमें बेहद कम समय में लगने वाली प्रजातियां भी हैं।

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