हिन्दी दिवस पर विशेष : हिंदी की रेल चली

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– डॉ. वसुंधरा मिश्र

हिंदी की रेल चली, हिंदी की रेल चली
हिंदुस्तान की सिरमौर रेख्ता, रेख्ती खड़ी बोली
आज हिंदी बन विकास की उच्च सीढ़ियों पर चढ़ती चली
इतराती इठलाती कई भाषाओं की सखी सहेली
हिंदी की रेल चली हिंदी की रेल चली

देश विदेश की सरहदें पार कर दिलों में बसने लगी
अरबी-फ़ारसी उर्दू पुर्तगीज को गले लगा सबकी स्नेही बनी
पूर्व से पश्चिम उत्तर से मध्य भारत में हिंदी के रंग की बेल चढ़ती चली
हिंदी की रेल चली हिंदी की रेल चली

होली दिवाली तीज-त्यौहार हिंदी के रंग में रंगे
विभिन्नता में एकता को मजबूत करती हिंदी की लहर हवाओं में घुली।
हिंदी की रेल चली हिंदी की रेल चली

देश के पार विदेशों में हिंदी की सुरभि फलीफूली
मेरे और तुम्हारे बीच संपर्क सेतु बनी
हमजोली बनी हिंदी
हिंदी की रेल चली हिंदी की रेल चली

नागपुर से भोपाल मॉरिशस युगांडा से फिजी फिर त्रिनिदाद गुयाना
दिल्ली की शान बनी हिंदी, राजभाषा बनी
निज भाषा की शान लगी हिंदी
हर दिल की आवाज़ बनी हिंदी
हिंदी की रेल चली हिंदी की रेल चली

सरल सहज और गतिशील धारा में बहती रही
वेदों और संस्कृत से निःसृत गंगा सी फैलती रही
भारत की विशाल धरती पर
दूब बनी देवों के सिर पर चढ़ती रही
भागीरथी देव भाषा की प्रहरी बन
संस्कृति और संस्कार बन बहने लगी
हिंदी की रेल चली हिंदी की रेल चली

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