1857 की क्रांति के गुमनाम चेहरे : अंग्रेजों से लोहा लेने वाले हरेकृष्ण सिंह

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बात जब 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में बिहार के योगदान की होती है तो बाबू कुँवर सिंह याद आ जाते हैं। निश्चित रूप से उनका नाम क्रांति के इतिहास में स्वर्णाक्षऱों में अंकित होने योग्य हैं…मगर हमें उन लोगों को भी याद रखना चाहिए जो उनके साथ रहे और जिन्होंने उनको क्रांति में भाग लेने के लिए प्रेरित किया..जी हाँ…ऐसे ही एक स्वाधीनता सेनानी की बात कर रहे हैं हम। ये कोई और नहीं बल्कि बाबू कुँवर सिंह के सेनापति हरेकृष्ण सिंह हैं। इन्होंने ही बाबू कुँवर सिंह को 1857 की क्रांति में भाग लेने के लिए राजी किया था और इनको ही सेना की कमान सौंपी गयी थी।

1857 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के महान योद्धा बाबू कुंवर सिंह के प्रमुख दूसरे सहायक सेनापति थे हरेकृष्ण सिंह। वे बाबू कुंवर सिंह के सबसे अधिक प्रभावशाली सेना में से थे। हरेकृष्ण सिंह पीरो परगना के तहसीलदार थे। 1857 के विद्रोह के समय उनकी उम्र तीस साल के करीब थी। जिस समय दानापुर छावनी में सैनिकों के बीच विद्रोह की स्वर फूट रही थी, उसकी हालात जानने के लिए बाबू कुंवर सिंह ने उन्हें वहां भेजा। वे बाबू कुंवर सिंह के वे बहुत अधिक विश्वासपात्र सैनिक थे। यही कारण है कि दानापुर सैनिक छावनी में पहुंचकर सैनिकों से गुप्त मुलाकात कर कुछ विद्रोही सैनिकों को अपने साथ लेकर आरा लौट आए।

आयर की फौज के आरा आने से लेकर कंपनी सरकार की फौज द्वारा जगदीशपुर पर कब्जा कर लेने तक जितनी लड़ाइयां हुई, उन सभी में हरेकृष्ण सिंह ने बढ़चढ़ कर भाग लिया। इसके बाद वे कुंवर सिंह के साथ सासाराम की पहाड़ियों के जंगल में चले गए। इस बीच में उनकी गिरफ्तारी के लिए सरकार की ओर से तीन हजार रुपये के इनाम की घोषणा की गई थी। बाद में इनाम की यह राशि बढ़ाकर पांच हजार रुपये कर दी गई थी। हरेकृष्ण सिंह के मुकदमे के कतिपय गवाहों के बयान से प्रकट होता है कि आजमगढ़ की चढ़ाई में वे बिहार की विद्रोही सेना के सेनापति थे। इस लड़ाई में सफलता प्राप्त करने के फलस्वरुप बाबू कुंवर सिंह ने उन्हें ‘सोलार जंग’ की उपाधि से विभूषित किया था।

सन् 1858 ई के आरंभ में अपने मुकदमें में 40वीं देसी पलटन के हवलदार रणजीत राम ने जो बयान दिया था, उससे प्रकट होता है कि शिवपुर-घाट होकर गंगा पार करते समय हरेकृष्ण सिंह बाबू कुंवर सिंह के साथ थे। बाद में हरेकृष्ण सिंह ता.29 अगस्त (सन् 1859 ई)को बनारस के दशाश्वमेध के नायब कोतवाल के द्वारा बनारस जिले के भदावल परगने के दिनिया मौजा में पकड़े गए। कुछ दिनों तक वे आरा जेल में रखे गए। इसके बाद कई अपराधों के लिए उन पर मुकदमा चलाया गया। उनका विचार शाहाबाद के स्थानापन्न जज और स्पेशल कमिश्नर आर.जे.रिचर्डसन के इजलास में सन् 1857 ई के अधिनियम 14 के अनुसार उनके बारे में अदालत का फैसला हुआ कि आरा जेल से उन्हें जगदीशपुर के चौक पर ले जाए और वहां उन्हें फांसी पर लटका कर मृत्युदंड दिया जाए। स्थानापन्न जज और स्पेशल कमिश्नर ने सन् 1857 ई के अधिनियम 14 के अनुसार जो फैसला दिया था, उसके अनुसार हरेकृष्ण सिंह को जगदीशपुर के चौक पर फांसी दे दी गई।

(साभार – दैनिक जागरण)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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