2 दोस्तों ने शुरू किया फूड फॉरेस्ट, टर्नओवर 15 करोड़, दिये 200 रोजगार

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आईआईटी से पढ़े दोस्तों ने ‘बीफॉरेस्ट’ नाम से स्टार्टअप शुरू किया है। जहां लोग नेचर में रहने के साथ परमाकल्चर फार्मिंग, यानी एक ही फार्मिंग लैंड पर एक साथ फल, सब्जियां, मसाले और अनाज उगा रहे हैं। इस अनूठे स्टार्टअप से पर्यावरण को तो फायदा हो ही रहा है। साथ ही उनकी अच्छी कमाई भी हो रही है। दोनों दोस्त सालाना 15 करोड़ रुपये का टर्नओवर कमा रहे हैं। इतना ही नहीं इस मुहिम के जरिए 200 से ज्यादा लोगों को रोजगार भी मिल रहा है।
37 साल के सुनीथ रेड्डी और 39 साल के शौर्य चंद्र हैदराबाद के रहने वाले हैं। सुनीथ ने कंप्यूटर साइंस की पढाई आईआईटी चेन्नई से की और शौर्य ने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग IIT रुड़की से करने के बाद आईआईएम अहमदाबाद से मैनेजमेंट किया। इसके बाद दोनों ने इंटरनेशनल कंपनी में काम किया, जहां उनकी अच्छी खासी तनख्वाह थी, बावजूद इसके उन्होंने कुछ अलग और नया करने का प्लान किया।
शौर्य चंद्र कहते हैं, ‘मैं और सुनीथ 13 साल से एक साथ काम कर रहे हैं और हमें शुरू से प्रकृति से बहुत लगाव रहा है। इसलिए हमने सोचा कि एक ऐसा काम शुरू कि जाए जो प्रकृति से जुड़ा हो। इस तरह से बीफारेस्ट स्टार्ट करने का आइडिया आया।’
सुनीथ बताते हैं स्टार्टअप का नाम ‘बी हैप्पी’ शब्द के तर्ज पर ‘बीफॉरेस्ट’ रखा। इसके पीछे हम लोगों को सन्देश देना चाहते हैं कि जिस तरह जीने के लिए खुश रहना जरूरी है उसी तरह प्रकृति के लिए जंगल और नेचुरल फार्मिंग भी जरूरी है। अगर प्रकृति से कुछ लेना है तो उसके साथ तालमेल बना कर रखना जरूरी है।
बीफॉरेस्ट में एक साथ एक ही जमीन पर कई तरह के फसलें उगाई जा सकती हैं। यानी फल, सब्जियां, मसाले, अनाज हर तरह की फसलों का लाभ लिया जा सकता है। बीफॉरेस्ट में एक साथ एक ही लैंड पर कई तरह के फसलें उगाई जा सकती हैं। यानी फल, सब्जियां, मसाले, अनाज हर तरह की फसलों का लाभ लिया जा सकता है।
शौर्य बताते हैं, “हमने स्टार्टअप से पहले रिसर्च किया, जिसमें पता चला बड़े किसानों की तुलना में छोटे किसानों को फार्मिंग से ज्यादा फायदा नहीं हो पता है। उसके कई कारण हैं- जैसे छोटे लैंड पर एक ही तरह की फसलों की फार्मिंग करना या मार्केट में उनकी फसलों का सही कीमत न मिलना। सभी के लिए बड़ी जमीन खरीद कर उस पर खेती करना संभव भी नहीं है। तब हमने छोटे-छोटे किसानों को एक साथ जोड़कर खेती करना शुरू किया।”
कन्वेंशनल फार्मिंग में एक ही तरह की फसल एक ही खेती योग्य जमीन तैयार की जाती है। जहां ज्यादा से ज्यादा उत्पाद के लिए केमिकल और पेस्टिसाइड्स के का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि ‘परमाकल्चर’ इससे बिलकुल अलग है। परमाकल्चर में एक ही साथ एक ही फार्मिंग लैंड पर कई तरह की फसलें उगाई जाती हैं। इसमें केमिकल और पेस्टिसाइड का इस्तेमाल नहीं होता है। सुनीथ बताते हैं, “परमाकल्चर का सबसे बड़ा फायदा ये है कि एक फसल का बाई- प्रोडेक्ट दूसरी फसल को जल्दी उगाने में मदद करता है। इस तरह की फार्मिंग में फसलों को बाहर से न ही किसी तरह के केमिकल की जरूरत होती है और न ही मिट्टी का पोषण खत्म होता है। जैसे पेड़-पौधे प्रकृति से पोषण लेकर खुद ही बढ़ते हैं, वैसा ही परमाकल्चर में भी होता है।”
इसमें बहुत ही कम लागत में ज्यादा से ज्यादा उत्पादन किया जा सकता है। यहां कम संसाधन में प्राकृतिक रूप से फसल उगाया जा सकता है। सबसे अच्छी बात है कि साल भरा फार्मिंग लैंड पर किसी न किसी फसल का उत्पादन होता रहता है।
बीफारेस्ट में कई लोग जुड़ कर एक बड़ा फार्मिंग लैंड खरीदते हैं। फिर एक साथ बहुत ही कम लागत में ज्यादा से ज्यादा फसलों का उत्पादन किया जाता है। बीफारेस्ट का लैंड दिखने में किसी फारेस्ट की तरह ही दिखेगा। एक फूड फारेस्ट जहां जामुन, कटहल, संतरा, चेरी, कॉटन सिल्क, काली मिर्च और कॉफी सहित कई और फैसले उगाई गई होंगी। इस मुहिम से कोई भी जुड़ सकता है। सभी को शेयर भी बराबर का मिलता है।
सुनीथ बताते हैं,“पहले प्रोजेक्ट में शौर्य के अलावा, कुछ और लोग बीफॉरेस्ट से जुड़े थे। फार्मिंग के लिए हैदराबाद से पास किसी गांव में जमीन तलाशना शुरू कर दिया। हम सभी ने एक साथ जमीन के छोटे-छोटे हिस्सों पर काम करना शुरु कर दिया। पहले प्रोजेक्ट का रिजल्ट अच्छा रहा तो हमने अपने काम को और बढ़ाया। एक साल में हमारे प्रोजेक्ट में से काफी लोग जुड़ गए और धीरे-धीरे काम बढ़ता ही जा रहा है। फिलहाल बीफॉरेस्ट के चार प्रोजेक्ट हैदराबाद, मुंबई, कूर्ग और चिकमंगलूर में तकरीबन 500 एकड़ जमीन पर चल रहा है। जिसमें सुनीथ और शौर्य के साथ हर प्रोजेक्ट में अलग अलग साझेदार हैं।
प्रकृति के बीच रह कर प्राकृतिक संसाधनों की मदद से खेती होती है। ऐसे कई लोग हैं जो शहर की जिन्दगी छोड़, प्रकृति के नजदीक रहना चाहते हैं। यह स्टार्टअप उन्हें जंगल में रहने के साथ साथ कमाई करने में भी मदद मदद करता है। यहां पेड़-पौधे और फसल तो हैं हीं इसके अलावा घर भी परम्परागत तरीके से बने हैं जो पूरी तरह इको- फ्रेंडली होते हैं।
शौर्य ने कहते हैं, ‘हम यहाँ स्थानीय लोगों के साथ मिलकर काम करते हैं। इसलिए जो भी साझेदार गाँव में आकर रहना या काम करना चाहता है, वो इस बात का ध्यान रखता है कि यहां के लोग और उनके कल्चर को बढ़ावा मिले।’ सब एक साथ मिलजुल कर काम करते हैं
बीफॉरेस्ट में जमीन किसी एक व्यक्ति के पास न होकर परियोजना में शामिल सभी साझेदारों की होती है। सभी ग्रुप में मिलजुल कर काम करते हैं। एक ग्रुप के जरिए सभी किसानों को कैसे और क्या करना है, इसकी जानकारी दी जाती है। साथ ही खेती से होने वाली कमाई को कैसे आपस में बांटना है ये भी तय किया जाता है। शौर्य बताते हैं, “बीफारेस्ट स्थानीय किसानों को उनकी खेती की सही कीमत दिलाने और उन्हें सही बाजार में ले जाने में भी मदद करता है।
(साभार – दैनिक भास्कर)

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