25 हजार बच्चों को शिक्षा, भोजन और जीने का सलीका सिखा रहा यह परिवार

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आईआईटी खड़गपुर और आईआईएम अहमदाबाद से विनायक ने की है पढ़ाई

शहरी आबादी से दूर जंगल में 24 किमी अंदर काली रातड़ी गांव है। यहां बने 10 कच्चे घरों में से एक सामूहिक प्रार्थना से गूंज रहा है। इस घर के आंगन में बैठे 60 बच्चे यह प्रार्थना कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण विवेकानंद सेवा कुटीर नाम का यह विद्यालय ‘परिवार’ कहलाता है और यह परिवार मप्र में ऐसे 254 स्कूल चला रहा है, जिनमें बिजली और पानी जैसी मूल सुविधाओं से वंचित 25 हजार आदिवासी, बेसहारा बच्चे पढ़ रहे हैं। इन बच्चों को बगैर किसी शुल्क के पढ़ाने के साथ दो वक्त का पौष्टिक भोजन खिलाया जाता है। उन्हें साफ-सुथरे कपड़े दिए जाते हैं।
साफ-सफाई से रहना भी सिखाया जाता है। फिलहाल नर्सरी से आठवीं तक की पढ़ाई कराई जा रही है। जल्द ही 12वीं और उसके बाद की पढ़ाई की सुविधा शुरू करने की तैयारी है। आईआईटी खड़गपुर और आईआईएम अहमदाबाद से पढ़े विनायक ने 2003 में कोलकाता से 3 बच्चों के साथ सेवा कुटीर की शुरुआत की थी। वे बताते हैं- यह लड़ाई सिर्फ अशिक्षा, कुपोषण व असमानता के खिलाफ है। मेरी शुरुआती पढ़ाई मप्र में हुई है। पिता यहां आईएएस रहे हैं। उनके साथ यहां की जमीनी हकीकत को देखा है।
विनायक बताते हैं कि 2016 में एमपी में सेवा कुटीर का विस्तार किया। फिलहाल 8 जिलों देवास, श्योपुर, मंडला, सीहोर, छिंदवाड़ा, खंडवा, विदिशा और डिंडोरी में सेवा कुटीर चला रहे हैं। रेसीडेंशियल एजुकेशन सेंटर भी बना रहे हैं, जहां ये बच्चे रह भी सकेंगे। फिलहाल पश्चिम बंगाल में परिवार का सबसे बड़ा नि:शुल्क आवासीय शिक्षण संस्थान है, जिसमें दो हजार से अधिक बच्चे हैं। 2023 तक 500 सेंटर शुरू करने का लक्ष्य है, जिनमें 50 हजार बच्चे पढ़ सकेंगे। सेवा कुटीर के एक सेंटर का खर्च करीब 12.5 लाख रु. है। प्रदेश में 254 सेंटर हैं। इन्हें चलाने के लिए संस्था बड़ी कंपनियों के सीएसआर फंड और एकल दानदाताओं पर निर्भर है। हाल ही में 5 रेसीडेंशियल सेंटर्स के निर्माण की फंडिंग सचिन तेंदुलकर ने की है।
5 गांवों में चल रहे कुटीरों की देखभाल कर रहे सिद्धार्थ परमार बताते हैं कि ये सभी बच्चे सरकारी स्कूलों में भी जाते हैं। सरकारी स्कूलों में 200-300 बच्चों पर एक शिक्षक होता है। साधन भी नहीं होते। इन्हीं कमियों को सेवा कुटीर पूरी करता है। स्कूल के पहले सुबह 3 घंटे और स्कूल के बाद शाम को 3 घंटे ये बच्चे कुटीर में बिताते हैं। हम कोई भवन अलग से नहीं बनाते, बल्कि गांव का ही कोई ऐसा घर चुन लेते हैं, जहां थोड़ी जगह हो और बच्चे बैठ सकें।
(साभार – दैनिक भास्कर)

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