60 की उम्र तक करोबार किया, अब रोज 6000 रुपये खर्च कर 250 आदिवासियों को खाना बाँटते हैं

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बालाचंद्रा 250 परिवारों को महीने के तीसरे रविवार को पालमलाई में 5-5 किलो चावल, 1-1 किलो दाल भी देते हैं
कोयम्बटूर : तमिलनाडु के जिले तूतूकुडी में रहने वाले 63 साल के बालाचंद्रा पिछले डेढ़ साल के रोज 250 आदिवासियों के लिए खाने का पैकेट बांट रहे हैं। वह रोज जिले की पहाड़ी बस्तियों पानप्पल्ली, कोंडानुर, जम्बुकंडी, कुट्टुपुली और थेक्कालूर में जाते हैं और लोगों को घर-घर जाकर स्वादिष्ट खाना देते हैं। खाना देने का समय रोज दिन में 11 बजे से 12 बजे की बीच होता है। इसके अलावा सभी परिवारों को महीने के तीसरे रविवार को पालमलाई में 5-5 किलो चावल, 1-1 किलो दाल देते हैं।
वह कहते हैं, ‘‘मैं 14वीं शताब्दी के कावेरीपत्तनम के संत पत्तिनाथर से प्रभावित होकर जरूरतमंदों की मदद करता हूं।’’ तमिलनाडु में पत्तिनाथर नाम से दो संत कवि हुए हैं। इनमें एक का जीवन काल 10वीं सदी और दूसरे का 14वीं सदी है।
अब मैं खुद से किए गए वादे को पूरा कर रहा हूं
बालचंद्रा कहते हैं, ‘‘मैं तूतूकुडी के सम्पन्न कारोबारी परिवार से हूं। मैंने काफी पैसा कमाया है। जब मैंने कारोबार शुरू किया था, तब से विचार था कि मैं जरूरतमंदों को भोजन कराउंगा। मैंने अपने जीवन के 60 साल परिवार को दिए। उनकी सभी जरूरतें पूरी कीं। अब मैंने व्यवसाय छोड़ दिया है। सभी तरह की प्रतिबद्धताओं से मुक्त हूं। अब मैं खुद से किए गए वादे को पूरा कर रहा हूं। आदिवासियों के खाना बनाने का काम थडगाम में रहने वाली एक महिला करती है। प्रतिदिन के खाने पर करीब 6 हजार रुपए खर्च होता है।’’
परिवार सब अपनी-अपनी जगह सेट
अपने बारे में बालाचंद्रा कहते हैं, ‘‘परिवार में पत्नी, बेटा और दो बेटियां हैं। बेटा कोयम्बटूर के मल्टी स्पेशिएलिटी हॉस्पिटल में एमडी है। बेटियां अपने-अपने घर विदेशों में सेटल हो गईं। पत्नी का जन्म स्थान कोयम्बटूर के पास है। वह अपने आखिरी दिन वहीं बिताना चाहती है।’

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