74% लड़के चाहते हैं, अगर मौका मिले तो अंग्रेजी नहीं, अपनी भाषा में करेंगे इंजीनियरिंग

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लड़कियां ऐसा कम चाहती हैं
देश के 74 प्रतिशत लड़कों ने इच्छा जताई है कि यदि उन्हें मौका मिले तो वे अपनी भाषा में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करेंगे। हालांकि इस तरह की इच्छा रखने वालों में लड़कियां कम हैं। महज 26 प्रतिशत ही। एआईसीटीई (अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद) के एक सर्वे में ऐसे कुछ रोचक तथ्य सामने आए हैं। दरअसल, नयी शिक्षा नीति (2020) में इंजीनियरिंग और मेडिकल सहित सभी पढ़ाई क्षेत्रीय व मातृ भाषा में पढ़ाने पर जोर दिया गया है। इसी के मद्देनजर एआईसीटीई ने प्रो. प्रेम व्रत की अध्यक्षता में एक समिति बनाई है। उसे बीटेक/बीई की पढ़ाई मातृभाषा में कराने की संभावना तलाशने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
83,195 छात्र-छात्राओं के बीच सर्वे
इस समिति ने देश के 83,195 छात्र-छात्राओं के बीच सर्वे कराया। इस सर्वे में 10वीं, 12वीं सहित इंजीनियरिंग के चारों वर्षों के बच्चों की राय ली गई है। इसके निष्कर्षों के मुताबिक 10वीं की पढ़ाई कर रहेे 72 फीसदी तो 12वीं में पढ़ रहे 74 फीसदी लड़के अपनी भाषा में तकनीकी शिक्षा लेना चाहते हैं। जबकि लड़कियों में 10वीं की 28% और 12वीं की 26% ही ऐसी मिलीं, जो मातृभाषा में तकनीकी शिक्षा लेने की इच्छा रखती हैं। कुल 44 फीसदी (36,432) बच्चों ने मातृभाषा में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की इच्छा जताई है। इनमें सबसे बड़ी तादाद तमिलभाषियों (90%) की है। जबकि हिंदी में करीब 60%, तेलुगु में 30%, मराठी में 27% और कन्नड़ व गुजराती के 10-10% बच्चों ने मातृभाषा में बीई/बीटेक करने के लिए ‘हां’ कहा है।
मलयालम, बंगाली और उड़िया बोलने वाले 5% से भी कम बच्चे ऐसा चाहते हैं। यह सर्वे 22 क्षेत्रीय भाषाओं के विद्यार्थियों के बीच किया गया। इस बाबत एआईसीटीई के अध्यक्ष प्रो. अनिल सहस्रबुद्धे ने कहा कि मातृभाषा में उच्च शिक्षा मुहैया कराने के लिए अच्छी गुणवत्ता की किताबें और शिक्षकों की उपलब्धता महत्वपूर्ण है। इस दिशा में एआईसीटीई ने बड़ी संख्या में स्थानीय भाषाओं में पुस्तक लेखन व अनुवाद शुरू करा दिया है।
देश में उच्च शिक्षा में नामांकन की दर अभी सिर्फ 27 फीसदी
सहस्रबुद्धे के मुताबिक देश में उच्च शिक्षा की नामांकन दर 27% है। इसकी बड़ी वजह ये है कि मातृभाषा में पढ़ रहे 10वीं-12वीं के बच्चों में ये डर रहता है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई उन्हें समझ में नहीं आ आएगी। ऐसे में, अगले 15 वर्षों में यदि हमें उच्च शिक्षा में नामांकन की दर को 50% तक ले जाना है तो मातृभाषा में शिक्षा का विकल्प मुहैया कराना ही होगा।
(साभार – दैनिक भास्कर)

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