ऐ सखी सुन – एक दीपावली ऐसी हो जो मानव मुक्ति का प्रकाश बिखराए

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गीता दूबे

भाग -4 

सभी सखियों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ। दीपक की तरह जगमगाइए और दीपावली मनाइए। हर भारतीय त्यौहार की तरह यह त्यौहार भी बुराई पर अच्छाई की विजय के उपलक्ष्य में घर परिवार की खुशहाली के लिए मनाया जाता है। हालांकि है तो यह देवी पूजा का त्यौहार लेकिन इस देवी को प्रसन्न करने के लिए अपने घर को साफ सुथरा रखना, सजाना और संवारना पड़ता है जिसके लिए देवी की छोटी बहनें या पुत्रियां अतिरिक्त मेहनत करती हैं। याद कीजिए वह जमाना जब घर मिट्टी के हुआ करते थे। तब फर्श पर पोंछा नहीं लगाया जाता था बल्कि उसे लीपना पड़ता था। गोबर, मिट्टी और पानी को मिलाकर एक घोल बनाया जाता था और उस घोल को कपड़े (पोतनहर) की सहायता से जमीन पर फैलाते हुए फर्श को चिकनाया जाता था। मिट्टी की दीवारे भी वैसे ही लीपी जाती थीं। बहुधा यह काम घर की औरतें ही करती थीं। तब से आज तक भारतीय समाज और घरों में क्रांतिकारी परिवर्तन आ चुका है। तमाम तरह के फिनाइल और जमीन की सतह को कीटाणु मुक्त करनेवाले रसायनिक घोल बाजार में उपलब्ध हैं लेकिन एक बात अब भी नहीं बदली वह है, महिलाओं की भूमिका। जब भी हम टेलिविजन पर इन सफाई घोलों का विज्ञापन देखते हैं तो उस विज्ञापन में महिलाओं की उपस्थिति अनिवार्य होती है जैसे यह जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ महिलाओं की ही हो। वैसे विज्ञापन किसी भी वस्तु का क्यों ना हो महिलाओं और वह भी खूबसूरत और आकर्षक महिलाओं की उपस्थिति मानो अनिवार्य सी होती है। खैर बात करें दीपावली जैसे त्यौहार की जिसमें गृहलक्ष्मी पर न केवल घर को सजाने संवारने की जिम्मेदारी होती है बल्कि ढेरों पकवान बनाकर सबकी जिह्वा को संतृप्त करने का काम भी करना पड़ता है। और इन तमाम कमर तोड़ू कामों के उपरांत स्वयं भी सज संवर कर त्यौहार की खुशियों का हिस्सा होना पड़ता है। प्रश्न यह है कि होली हो या दीपावली, त्यौहार को आनंददायक बनाने एवं सबके चेहरे पर मुस्कान खिलाने की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ महिलाओं की ही क्यों होती है। हालांकि कहने को जमाना बदल रहा है, हम आधुनिकता की परिधि को लांघ कर उत्तर आधुनिकता की ओर न जाने कब बढ़ गये लेकिन शायद यह आधुनिकता ऊपरी ताम झाम और साहित्य तक ही सुरक्षित रह गई हैं। अपनी मानसिक बुनावट में हम अब भी मध्ययुगीन ही हैं। तभी तो इस तथाकथित उत्तर आधुनिक दौर में भी स्त्री और‌ पुरूष के लिए अलग- अलग नियम कायदे हैं। अवसर कोई भी हो , स्त्रियों की जिम्मेदारियों का भार हमेशा पुरूषों से कुछ ज्यादा ही होता है। त्याग तपस्या की घुट्टी पिलाकर और मर्यादा का पाठ पढ़ाकर उनके इर्द-गिर्द जिम्मेदारियों की एक ऐसी लक्ष्मण रेखा खींच दी जाती है जिसके अंदर वह कितना भी क्यों ना कसमसा लें लेकिन उसे लांघने की हिम्मत नहीं कर पातीं क्योंकि वे उसका परिणाम जानती हैं। पौराणिक इतिहास के अध्यायों ने उन्हें सिखा दिया है कि लक्ष्मण रेखा का अतिक्रमण करनेवाली स्त्री को कहीं ठौर ठिकाना नहीं मिलता है। अगर जनक की दुहिता और दशरथ की पुत्रवधू सीता को न केवल अग्निपरीक्षा देनी पड़ी बल्कि गर्भावस्था में भी निष्कासन की पीड़ा तक झेलनी पड़ी तो साधारण नारी की बिसात ही क्या। याद कीजिए राम के वनवास काट कर अयोध्या लौटने की खुशी में दीपावली का त्यौहार मनाया जाता है लेकिन सीता जो राम के हर दुख सुख में साथ रहीं। यह कहना गलत नहीं होगा कि उन्होंने सुख की अपेक्षा दुख ही अधिक देखा और इस दुख ने उन्हें राजरानी से विषाद की मूर्ति में परिवर्तित कर दिया। सीता का वनवास तो कभी समाप्त ही नहीं हुआ। वह तो अस्थायी राजरानी बनीं जिन्होंने अपने पति अयोध्या के राजा राम अथवा मर्यादापुरुषोत्तम राम की तथाकथित मर्यादा का  भार आजीवन ढोया। आज राम की अयोध्या दीपावली के लिए दुल्हन सी सज रही है लेकिन उस राम के बगल में सीता का स्थान अभी तक रिक्त हैं। न जाने सीता की अयोध्या वापसी कब होगी। लोक कवि तुलसीदास ने लिखा है-

“सिय राम मय सब जग जानी, करहु प्रणाम जोरी जुग पानी ।।” 

हालांकि राम के साथ सीता हर मंदिर में खड़ी दिखाई देती हैं लेकिन राम के जीवन में वह अपने निष्कासन के उपरांत दोबारा कभी नहीं लौटी, यह रामकथा का सामान्य पाठक भी जानता है, शायद इसीलिए लोक गीतों की सीता अपना विषाद और आक्रोश इस तरह व्यक्त करती हैं-

“सवना भादौना क रतिया, मैं गरुए गरभ से रे

गुरु ऊई रामा घर से निकारें, लौटि नहीं चितवहि रे?

*****  *****   ******

गुरु फाटै जो धरती समाबे, अजोध्या नहीं जाबै रे

गुरु फेर हियें चली औबे, राम नहीं देखबै रे”

 तो सखियों जब सीता जैसी रानी की ऐसी स्थिति हो सकती है तो सामान्य स्त्री अपने साधारण से जीवन में न जाने कितने दुख, दर्द संताप झेलने को विवश होती है। यह दीपावली उन तमाम स्त्रियों को समर्पित है जो सीता की तरह दर्द तो झेलती हैं लेकिन उनकी व्यथा कथा अलिखित ही रह जाती है। दीयों की झिलमिलाहट और उसकी रोशनी की पृष्ठभूमि में उन तमाम स्त्रियों का दर्द संचित रहता है जो समाज निर्मित तथाकथित मूल्यों, यथा- समर्पण, त्याग और तपस्या के बल पर गृहालक्ष्मी के पद पर न केवल आसीन होती हैं बल्कि उस पर निरंतर बने रहने का दंड भी झेलती हैं। यह यंत्रणादायक गौरवमई परंपरा कभी ना कभी अवश्य अंतिम साँस लेगी, इस कामना के साथ दीपावली मनाएँ। एक ऐसी दीपावली जो मानव मुक्ति का प्रकाश बिखराए और उस प्रकाश में असूर्यम्श्या नारियाँ भी आलोकित हो मुक्ति की साँस ले सकें। तो फिलहाल विदा सखियों। अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी।

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