Thursday, January 20, 2022
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स्त्री शिक्षा की राह खोलने वाली भारत की पहली शिक्षिका सावित्री बाई फुले

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आज अगर बात शिक्षा के क्षेत्र की हो तो महिला शिक्षिकाओं के बिना शिक्षण संस्थानों की कल्पना करना कठिन है लेकिन एक समय ऐसा भी रहा जब स्त्रियाँ शिक्षा पाने के अधिकार से वंचित थीं। हालाँकि आज भी स्थिति पूरी तरह बदली नहीं है मगर स्थिति पहले की तुलना में बेहतर बहुत हुई है। ऐसे समय में जब स्त्रियों के लिए शिक्षा प्राप्त करना ही बड़ी चुनौती हो, वहाँ पर किसी महिला के शिक्षिका होने की कल्पना भी कठिन लगती है। ऐसी स्थिति में एक महिला ने संघर्ष किया और इस संघर्ष में अपने पति के सहयोग से उन्होंने स्कूल चलाया, लोग उनके इस दुस्साहस पर ताने फेंकते और स्कूल जाते हुए उन पर गोबर फेंकते मगर उन्होंने स्त्री शिक्षा का यज्ञ आरम्भ किया, उसी यज्ञ का प्रतिफलन है कि आज लड़कियाँ पढ़ भी रही हैं और पढ़ा भी रही हैं। शिक्षा की मशाल से समाज को आलोकित करने वाली यह महिला थीं सावित्री बाई फुले जो भारत की पहली शिक्षिका एवं प्रधानाध्यापिका हैं।
3 जनवरी 1831 को सावित्रीबाई फुले का जन्म हुआ था। समाज सुधारक और कवयित्री भी थीं सावित्री बाई, पति ज्योतिबा फुले के प्रोत्साहन से वे बाधाओं की परवाह किये बगैर निरन्तर आगे बढ़ती रहीं। उनको आधुनिक मराठी कविता की अग्रदूत भी कहा जाता है। 1852 में उन्होंने लड़कियों के लिए स्कूल खोला था। सावित्रीबाई के पिता का नाम खन्दोजी और माता का नाम लक्ष्मी थी। उनका विवाह 1840 में ज्योतिबा फुले से हुआ था। पहले ज्योतिबा को ज्योति राव के नाम से जाना जाता था। वे सावित्रीबाई के संरक्षक और गुरु के साथ मार्गदर्शक भी थे।
सावित्रीबाई ने अपने जीवन को एक मिशन की तरह से जीया जिसका उद्देश्य था विधवा विवाह करवाना, छुआछूत मिटाना, महिलाओं की मुक्ति और दलित महिलाओं को शिक्षित बनाना था। जब वो स्कूलों में पढ़ाने जाती थीं, तो लोग रास्ते में उन पर कीचड़ और गोबर फेंका करते थे, इसलिए सावित्रीबाई अपने थैले में दूसरी साड़ी लेकर चलती थी और स्कूल में बदल लिया करती थीं। सन 1854 में उनकी पहली पुस्तक ‘काव्य फुले’ प्रकाशित हुई थी। इसके अलावा सावित्रीबाई ने कई कविताओं और भाषणों से वंचित समाज को जगाया, लेकिन अभी भी उनकी कहानी देश की 70 प्रतिशत से ज़्यादा आबादी से दूर है।
24 सितंबर 1873 को ज्योतिराव फुले ने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की, जो दहेज मुक्त और बिना पंडित पुजारियों के विवाह संपन्न कराती थी। सावित्रीबाई इस संस्था की एक सक्रिय कार्यकर्ता बनी। बाद में सावित्रीबाई ने अपने दत्तक पुत्र यशवंत का इसी संस्था के तहत पहला अंतरजातीय विवाह करवाया। भारतीय डाक ने 10 मार्च 1998 को सावित्रीबाई के सम्मान के रूप में डाक टिकट जारी किया। साल 2015 में पुणे विश्वविद्यालय का नाम सावित्रीबाई फुले विश्वविद्यालय किया गया। 3 जनवरी 2017 को गूगल ने सावित्रीबाई फुले के 186वीं जयंती पर अपना ‘गूगल डूडल’ बनाया।
28 नवंबर 1890 को अपने पति ज्योतिबा फुले के मरने के बाद, सावित्रीबाई लगातार उनके अधूरे समाज सुधार के कार्यों में लगी रहीं. 1896 में पुणे में आए भीषण अकाल में इस क्रांतिकारी महिला ने पीड़ितों की काफी सहायता की।
इसके साल भर बाद ही पूरा पुणे प्लेग की चपेट में आ गया, जिसमें सैकड़ों बच्चे मर रहे थे। सावित्रीबाई ने बेटे यशवंत को बुलाकर एक अस्पताल खुलवाया, जिसमें वह ख़ुद दिन- रात मरीजों की देखभाल करने लगीं। 10 मार्च 1897 को सावित्रीबाई ख़ुद इस संक्रामक बीमारी की चपेट में आकर उनका निधन हुआ।
( स्त्रोत साभार – न्यूज नेशन्स)

रिश्तों का बीमा नहीं मिलता

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– डॉ. वसुंधरा मिश्र

रिश्ते रेशमी बंधन हैं
बंधक बना देते हैं
तोड़ने के लिए मजबूर भी करते हैं
रिश्तों की मिठास
भावों से खेलती है
फिर कड़वे जहर घोलती है
रिश्ते बड़े स्वार्थी हैं
जब जुड़ते तो छूटते नहीं
जब टूटते तो जुड़ते नहीं
मन की अदृश्य सुई से सिले हैं
रिश्तों के अनगिनत नाज़ुक धागे
तार तार होते भी देर नहीं लगाते
माँ से जुड़ी हूँ मैं माँ मुझसे
माँ से भी बिगड़े हैं रिश्ते
प्यार और भावों की खुराक से बनते हैं रिश्ते
त्याग तपस्या बलिदान विश्वास पर टिकते हैं रिश्ते
थोड़ी सी ठसक से मर जाते हैं रिश्ते
फिर तो लाश की तरह ढोए जाते हैं रिश्ते
कितनी ही दुहाई दो
सब पानी में बह जाते हैं रिश्ते
किश्तों में समझौता नहीं होता
मनुष्यों के बीच की धूरी है रिश्ते
रीढ़ की हड्डी हड्डी की तरह सीधे नहीं है रिश्ते
निभाने के तरीके हैं रिश्ते
कश्ती में छेद की तरह हैं रिश्ते
अमूर्त में मूर्त होते हैं रिश्ते
दिखते हैं हौसला बढ़ाते हैं
काश! रिश्तों में स्थिरता होती
हर पल परिवर्तित होते हैं रिश्ते
रिश्तों के मरने के बाद
रिश्तों का बीमा नहीं मिलता

कर्मयोगी ‘दीपक’ तुमको न भुला पाएंगे

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– अंजू सेठिया

‘दीपक’ की आलोकित लौ हमेशा “जय हो” का उदघोष करती रहेगी l प्रणाम अंजू दी…………. की कोमल आवाज मेरे कानों में, हृदय के तारों में सदा प्रवाहित होती रहेगी।

याद है मुझे उसके साथ बिताए एक एक पल l बात उन दिनों से शुरू हुई करीब सन् 1996 में वह एक छात्र के रूप में मेरे संपर्क आया थाl बिरला हाई स्कूल से भारतीय भाषा परिषद तक। भारतीय भाषा परिषद मे हम दोनो युवा मंच से जुडे थे। वहां काफी कार्यक्रम सफलता पूर्वक आयोजित किये गये । मै आवाक रह जाती यह छोटा बच्चा और इतने गुण। भगवान का उपहार था। सबके काम आना ,निस्वार्थ काम करना आदि आदि क्या लिखूं क्या छोडूँ, किताबे भर जाएगी

उसने बाल्यकाल से ही ‘होनहार विरवान के होत चिकने पात’ को चरितार्थ कियाl अपने स्कूल -जीवन से ही सामाजिक – सांस्कृतिक गतिविधियों में उसकी गहन रुचि रही l भारत विकास परिषद की कोलकाता शाखा के संयोजन में पश्चिम बंगाल प्रांत में सन् 2000 में भारतीय भाषा परिषद में पहली राष्ट्रीय समूह गान प्रतियोगिता के आयोजन को अल्पायु में प्रिय दीपक ने सफल नेतृत्व और निर्देशन प्रदान किया था l करीब 11-12 विद्यालयों ने हिस्सा लिया था l दीपक में किसी भी सामाजिक – सांस्कृतिक – शैक्षणिक कार्यक्रम को सफलतापूर्वक आयोजन और संचालन करने की अद्भुत बहुमुखी प्रतिभा थी l अग्र युवा संगठन के कर्मठ सदस्य थे l कोलकाता के अग्रवाल सेवा समाज ने उसे अग्र गौरव से सम्मानित करके स्वयम् को सम्मानित महसूस किया था l

अपने लघु जीवन काल में आईसीएसआई में विभिन्न दायित्वों को बखूबी संभाला और आईसीएसआई के परचम को और ऊँचा लहराने में कोई कसर नहीं छोड़ी l मेरा मानना है कि हमारे आईसीएसआई ने इस विवेकानंद समान महान विभूति को खोया है l अन्तिम समय तक आईसीएसआई को उन्होंने अपनी मातृ का दर्जा दिया l कहता था कि ये भी मेरी माँ है, जिसके कारण ही मै आज इस योग्य हुआ हैl

जितना लिखा जाए, जितना कहा जाए, कम ही लगेगा l लोग शायद ठीक कहते हैं कि ईश्वर के घर भी ऐसे व्यक्तिव के धनी की सदा कमी रहती है और इसी कारण जल्दी वापस बुला लेते हैंl समय भला कब रुकता है l विधि का विधान अपनी गति से चलता ही रहता है l रंगमंच के कलाकारों की तरह इस नश्वर संसार में हर व्यक्ति को अपना किरदार निभाकर वापस जाना ही पड़ता है परंतु मेरे प्यारे दीपु को अपने जीवन काल में मात्र 43 बसंत ही देखकर इस मकर संक्रांति, 15 जनवरी, 2022 को संसार त्यागना पड़ेगा, ये तो कभी सोचा न था l

होनहार छात्र से लेकर एक कुशल अध्यापक, मार्गदर्शक, सबों के प्रेरणादायक, कर्तव्यनिष्ठ, धार्मिक आस्थावान, परोपकारी, कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता, सुहृदय, मृदुभाषी आदि बहुमुखी प्रतिभा से ओत प्रोत अपने छोटे भाई सीएस दीपक कुमार खेतान के लिए उपर वाले से प्रार्थना करती हूँ कि उसकी पावन आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दें 🙏💐🙏

डार्क एनर्जी टेलीस्कोप ने बनाया ब्रह्मांड का सबसे बड़ा थ्री डी नक्शा

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वॉशिंगटन । डार्क एनर्जी टेलिस्कोप ने ब्रह्मांड का सबसे बड़ा और सबसे विस्तृत 3D नक्शा तैयार किया है। इससे डार्क एनर्जी के पीछे के रहस्यों और हमारे ब्रह्मांड को व्यवस्थित करने के तरीकों के बारे में कई खुलासे हो सकते हैं। डार्क एनर्जी टेलीस्कोप को डार्क एनर्जी स्पेक्ट्रोस्कोपिक इंस्ट्रूमेंट (DESI) के नाम से जाना जाता है। यह एक अंतरराष्ट्रीय परियोजना है, जिसे लॉरेंस बर्कले नेशनल लेबोरेटरी (उर्फ बर्कले लैब) चलाता है।

अंतरिक्ष के विकास की समझ बढ़ेगी
डार्क एनर्जी एक अभी तक खोजी जाने वाली रहस्यमयी शक्ति है जो ब्रह्मांड के विस्तार को प्रेरित करती है। डार्क एनर्जी टेलीस्कोप का मिशन इस फोर्स की फिजिक्स की समझ को बेहतर करना है। इसके अलावा यह टेलिस्कोप पता लगा रहा है कि भविष्य में अंतरिक्ष कैसे विकसित हो सकता है। डार्क एनर्जी टेलीस्कोप सिर्फ एक साल से ही ब्रह्मांड का सर्वे कर रहा है, लेकिन वैज्ञानिकों ने इसकी उपलब्धियों को पहले ही प्रभावशाली और रोचक करार दे चुके हैं।

बर्कले लैब ने शेयर किया ब्रह्मांड का मैप
बर्कले लैब ने अपने ट्विटर अकाउंट पर ब्रह्मांड के सबसे बड़े 3डी मानचित्र का एक वर्जन शेयर किया है। बर्कले लैब के वैज्ञानिक जूलियन गोय ने कहा कि यह मैप बहुत सुंदर है। 3डी मैप में आकाशगंगाओं का डिस्ट्रिब्यूशन में क्लस्टर, तारों की लाइनें और निर्वात दिखाई दे रहे हैं। लेकिन उनके भीतर, आप बहुत प्रारंभिक ब्रह्मांड की छाप पाते हैं जो इसके विकास के इतिहास को बताता है। इस मैप से क्या पता चलेगा?
सर्वे का प्राइमरी काम पूरे आकाश के एक तिहाई से अधिक में फैले लाखों आकाशगंगाओं की विस्तृत कलर स्पेक्ट्रम फोटो को इकट्ठा करना है। हर एक आकाशगंगा से अपने रंगों के स्पेक्ट्रम में प्रकाश को तोड़कर डार्क एनर्जी टेलिस्कोप यह निर्धारित कर सकता है कि अरबों वर्षों के दौरान ब्रह्मांड के विस्तार से प्रकाश को कितना ट्रांसफर किया गया है।

75 लाख आकाशगंगाओं की स्थिति की जानकारी मिलेगी
वैज्ञानिकों के पास ब्रह्मांड का 3डी नक्शा होने से वे आकाशगंगाओं के क्लस्टर और सुपरक्लस्टर्स को चार्ट में शामिल करने में सक्षम हैं। इससे आकाशगंगाों के बनने के दिनों के बारे में जानकारी मिल सकती है। मनुष्य इस बारे में अधिक जान सकते हैं कि ब्रह्मांड का निर्माण कैसे हुआ और इसका विकास कैसे जारी रहेगा। लेकिन, ऐसा होने के लिए और अधिक शोध की जरूरत है। अब से नया नक्शा 75 लाख से अधिक आकाशगंगाओं के स्थान की ओर इशारा करेगा।

तीसरी लहर में हवाई टिकट रद्द करने पर सिर्फ एक तिहाई लोगों को मिला ‘रिफंड’!

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मुम्बई । कोरोना वायरस महामारी के ओमीक्रोन स्वरूप के रूप मे आई तीसरी लहर के कारण हवाई उड़ानों के टिकट रद्द करने वाले एक-तिहाई से भी कम लोगों को रिफंड या टिकट का पैसा वापस मिल पाया है। एक ऑनलाइन सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है। ऑनलाइन कम्युनिटी मंच लोकल सर्किल्स के एक सर्वेक्षण में पता चला कि महामारी की तीसरी लहर के आने की वजह से जिन लोगों को होटलों की अपनी बुकिंग निरस्त करनी पड़ी उनमें से 34 प्रतिशत को ही पैसा वापस मिला। इस सर्वेक्षण में भारत के 332 जिलों से लोगों के 20,000 से अधिक जवाब आए। ओमीक्रोन स्वरूप के मामले तेजी से बढ़ने के कारण भारत में ऐसे अनेक लोगों को अपनी यात्राएं रद्द या स्थगित करनी पड़ी हैं जिन्होंने जनवरी से मार्च के बीच यात्रा कार्यक्रम बना रखा था। उनमें से कुछ ने एयरलाइंस और होटलों से बुकिंग के लिए जमा की गई राशि वापस मांगी है।

सर्वेक्षण में हवाई यात्रा निरस्त होने के संबंध में पहला प्रश्न पूछा गया था जिसके जवाब में 29 प्रतिशत लोगों ने कहा, ‘‘ट्रैवल एजेंटों और एयरलाइन कंपनियों ने रद्दीकरण स्वीकार कर लिया और पूरा पैसा लौटा दिया, वहीं 14 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें आंशिक राशि मिली है।’’

वहीं, 29 प्रतिशत लोगों ने बहुत कम पैसा लौटाए जाने की भी बात कही। करीब 14 प्रतिशत लोगों के अनुसार उन्हें धनराशि नहीं लौटाई गई लेकिन बाद की तारीख के लिए उनका टिकट बुक कर दिया गया। लोकल सर्किल्स के संस्थापक सचिन तापड़िया ने कहा, ‘‘इस मंच पर लोग राय दे रहे हैं कि सरकार को कोविड महामारी जारी रहने तक यात्रा बुकिंग रद्द किए जाने पर, खासतौर पर एयरलाइंस और होटलों के लिए पैसा वापसी की विशेष नीति बनानी चाहिए।’’

शनि के इस चंद्रमा पर छिपा हुआ है गुप्त महासागर!

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सतह 32 किलोमीटर बर्फ की मोटी चादर से है ढका

वॉशिंगटन । सौर मंडल के दूसरे सबसे बड़े ग्रह शनि के एक चंद्रमा पर 32 किलोमीटर मोटी बर्फ की परत होने का दावा किया गया है। खगोलविदों का मानना है कि मीमास नाम के इस चंद्रमा की बर्फीली मोटी परत के नीचे एक गुप्त महासागर भी मौजूद है। मीमास शनि से सबसे नजदीक बड़े आकार के चंद्रमाओं में से एक है। मीमास चंद्रमा का व्यास 395 किलोमीटर का है। यह सबसे छोटा खगोलीय पिंड है जो अपने गुरुत्वाकर्षण के कारण सबसे अधिक गोल है।

पहले तरल होने के नहीं मिले थे संकेत
विशेषज्ञों के अनुसार, तस्वीरों और ऑब्जरवेशन से मीमास चंद्रमा पर किसी भी तरल पानी का कोई संकेत नहीं है, लेकिन कोलोराडो में साउथवेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के सिमुलेशन से पता चलता है कि इसकी बर्फ मोटी परत के नीचे एक महासागर छिपा हुआ है। 2014 में नासा कैसिनी अंतरिक्ष यान के नापतौल से पता चला है कि इस चंद्रमा की सतह के नीचे कुछ पानी हो सकता है। हालांकि, इसकी अबतक पुष्टि नहीं हुई है।

इस चंद्रमा की आंतरिक गर्मी से नीचे पिघली हुई है बर्फ
नई स्टडी में टीम ने छोटे चंद्रमा के आकार और उसकी बनावट संबंधी विशेषता का पता लगाया। इससे निर्धारित किया गया कि इसकी आंतरिक गर्मी बहते हुए पानी की स्थिति को बनाने में सक्षम है कि नहीं। इस चंद्रमा को सैटर्न I ( Saturn I) के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यह शनि के छल्लों के सबसे करीब है। मीमास का कुल क्षेत्रफल स्पेन की जमीनी क्षेत्र से थोड़ा ही कम है।
मीमास का सतह ऊपर से काफी कठोर
मीमास के ऊपरी सतह पर कोई भी फ्रैक्चरिंग या पिघलने का सबूत नहीं है। इस नए अध्ययन के प्रमुख लेखक एलिसा रोडेन ने न्यू साइंटिस्ट को बताया कि जब हम मीमास को देखते हैं तो यह एक छोटी, ठंडी, मृत चट्टान जैसी दिखाई देती है। अगर आप मीमास को अन्य बर्फीले चंद्रमाओं के एक समूह के साथ रखते हैं तो इसे देखते ही आप बोल उठेंगे कि इस चंद्रमा के पास एक महासागर है।

1789 में हुई थी मीमास की खोज
मीमास की खोज 1789 में अंग्रेजी खगोलशास्त्री विलियम हर्शल ने अपने 40 फुट के परावर्तक दूरबीन से की थी। नासा के कैसिनी अंतरिक्ष यान ने सबसे पहले इस चंद्रमा के आस पास उड़ान भरी थी। उसी ने इस चंद्राम की कई तस्वीरें भी जुटाई थी। इस चंद्रमा की औसत त्रिज्या 123 मील से भी कम है। इसकी ऊपरी सतह गड्ढों से ढकी हुई है। इसके कम घनत्व से पता चलता है कि इसमें लगभग पूरी तरह से पानी की बर्फ है, जो अब तक पाया गया एकमात्र पदार्थ है।

 

ट्रेनों के गार्ड साहब कहलाएंगे मैनेजर साहब 

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नयी दिल्ली । ट्रेनों में गार्ड को अब ‘गार्ड’ नहीं बुलाया जाएगा। भारतीय रेलवे ने कहा है कि अब ट्रेन गार्ड का नाम बदलकर ‘ट्रेन मैनेजर’ कर दिया गया है। यानी अब ट्रेन गार्ड को ट्रेन मैनेजर कहा जाएगा। यह फैसला तत्काल प्रभाव से लागू होगा। इस बारे में रेलवे बोर्ड ने सभी रेलवेज के जनरल मैनेजर्स को निर्देश जारी कर दिया है। सार्वजनिक तौर पर इसकी घोषणा भारतीय रेल ने ट्विटर के जरिए की है। जारी किए गए सर्कुलर के मुताबिक ट्रेनों में विभिन्न गार्ड्स की रिवाइज्ड डेजिग्नेशंस अब इस तरह होगी।
लवे ने यह भी कहा है कि पद के नाम में बदलाव का पे लेवल्स पर कोई असर नहीं होगा। इसके अलावा संबंधित पदों पर रिक्रूटमेंट, मौजूदा कर्तव्यों व जिम्मेदारियों, सीनियोरिटी और प्रमोशन से जुड़ी प्रक्रिया पर भी कोई असर नहीं होगा।
इस वजह से हो रही थी नाम बदलने की मांग
ट्रेन गार्ड्स के डेजिग्नेशन में बदलाव की मांग पिछले कुछ वक्त से हो रही थी। मांग थी कि ट्रेन गार्ड पदनाम अब पुराना हो चला है और समाज में लोग गार्ड का मतलब किसी प्राइवेट कंपनी आदि में गार्ड ( सिक्योरिटी गार्ड) से समझ लेते हैं। इसलिए मांग की जा रही थी कि इस पदनाम को ट्रेन मैनेजर नाम से बदल दिया जाए।

भारत में 120 साल में 2021 पांचवां सबसे गरम वर्ष

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नयी दिल्ली । भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने कहा कि वर्ष 2021 भारत में 1901 के बाद से पांचवां सबसे गर्म वर्ष था। इसमें देश में औसत वार्षिक वायु तापमान सामान्य से 0.44 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया। विभाग ने कहा कि देश में वर्ष के दौरान बाढ़, चक्रवाती तूफान, भारी बारिश, भूस्खलन, बिजली गिरने जैसी मौसमी घटनाओं के कारण 1,750 लोगों की मौत हुई है। मौसम विभाग के वार्षिक जलवायु वक्तव्य, 2021 में कहा गया है, ‘1901 से वर्ष 2021 देश में 2016, 2009, 2017 और 2010 के बाद पांचवां सबसे गर्म वर्ष था। देश के लिए औसत वार्षिक वायु तापमान सामान्य से 0.44 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया।’’उसने कहा, ‘सर्दियों और मानसून के बाद के मौसम में गर्म तापमान ने मुख्य रूप से इसमें योगदान दिया।’

विभाग ने कहा कि 2016 में देश के लिए औसत वार्षिक वायु तापमान सामान्य से 0.710 डिग्री सेल्सियस अधिक था। वर्ष 2009 और 2017 में औसत तापमान से यह क्रमश: 0.550 डिग्री सेल्सियस और 0.541 डिग्री सेल्सियस अधिक था।
उसने कहा कि 2010 में, औसत वार्षिक वायु तापमान सामान्य से 0.539 डिग्री सेल्सियस अधिक था। विभाग ने कहा कि भारत में आंधी तूफान और बिजली गिरने से 2021 में 787 लोगों की कथित तौर पर मौत हो गई जबकि उस वर्ष भारी बारिश और बाढ़ से संबंधित घटनाओं में 759 लोगों की मौत हो गई।
बयान में कहा गया है कि चक्रवाती तूफान की वजह से 172 लोगों की मौत हुई और मौसम से संबंधित अन्य घटनाओं के कारण 32 अन्य लोगों की मौत हो गई।

2000 साल पहले आसमान से बरसे थे सोने के सिक्के! पुरातत्वविदों को खेत में मिला ‘खजाना’

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बर्लिन । एक पुरातत्वविद ने उत्तरपूर्वी जर्मनी के एक राज्य ब्रेंडेनबर्ग में सेल्टिक सिक्कों के एक प्राचीन भंडार की खोज की है, जिसकी ‘कीमत बहुत अधिक रही होगी’। 41 सोने के सिक्कों को 2,000 से अधिक साल पहले ढाला गया था। यह ब्रेंडेनबर्ग में पहला ज्ञात सेल्टिक सोने का खजाना है। ब्रेंडेनबर्ग में संस्कृति मंत्री ने दिसंबर 2021 में इसकी घोषणा की थी। सिक्कों का आकार घुमावदार है जो इनके नाम ‘regenbogenschüsselchen’ से प्रभावित है, जिसका मतलब ‘इंद्रधनुष कप’ होता है। सिक्कों के ढेर का अध्ययन करने वाले और श्लॉस फ़्रीडेनस्टीन गोथा फ़ाउंडेशन के कॉइन कैबिनेट में मुद्राशास्त्री और रिसर्च अस्सिटेंट मार्जनको पाइलिक ने लाइव साइंस को बताया कि इसका नाम और आकार एक प्रसिद्ध कहानी की याद दिलाता है कि इंद्रधनुष के अंत में सोने का एक बर्तन होता है। माना जाता है कि इंद्रधनुष कप वहां पाए जाते हैं जहां एक इंद्रधनुष धरती को छूता है। उन्होंने बताया कि कहानियों का एक हिस्सा यह भी है कि इंद्रधनुष कप सीधे आसमान से गिरते हैं।
बारिश के बाद खेतों में मिलते थे सिक्के
उन्हें भाग्यशाली और इलाज के असर वाली चीजें माना जाता था। यह संभावना है कि किसानों को अक्सर बारिश के बाद अपने खेतों में प्राचीन सोने के सिक्के मिलते थे जो गंदगी और चमक से मुक्त होते थे। सिक्कों की खोज वोल्फगैंग हर्कट ने की है, जो ब्रेंडेनबर्ग स्टेट हेरिटेज मैनेजमेंट एंड आर्कियोलॉजिकल स्टेट म्यूजियम (बीएलडीएएम) के एक स्वयंसेवक पुरातत्वविद हैं। एक स्थानीय खेत की जांच के लिए मालिक से अनुमति मिलने के बाद उन्हें कुछ और चमकदार और सोने जैसा नजर आया।
जिंदगी में एक बार ही हो पाती है ऐसी खोज
पाइलिक ने कहा कि इसे देखकर उन्हें शराब की एक छोटी बोतल के ढक्कन की याद आ गई। हालांकि यह एक सेल्टिक सोने का सिक्का था। 10 सिक्कों को खोजने के बाद उन्होंने बीएलडीएएम को खोज की सूचना दी जिसके बाद पुरातत्वविदों ने कुल 41 सिक्कों का पता लगाया। हर्कट ने कहा कि यह एक असाधारण खोज है जिसे आप शायद जिंदगी में एक ही बार कर सकते हैं।

(साभार – नवभारत टाइम्स)

नहीं रहे वरिष्ठ पत्रकार कमाल खान

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लखनऊ । उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार कमाल खान (61) का निधन हो गया है। उन्होंने लखनऊ स्थिति अपने आवास में अंतिम सांस ली। कमाल खान का निधन दिल का दौरा पड़ने से हुआ। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
कमाल खान की शादी पत्रकार रुचि कुमार के साथ हुई थी। वह अपने परिवार के साथ लखनऊ के बटलर पैलेस स्थित सरकारी बंगले में रहते थे। शुक्रवार तड़के उन्होंने वहीं अंतिम सांसें लीं।
कमाल खान को उनकी बेहतरीन पत्रकारिता के लिए रामनाथ गोयनका पुरस्कार मिला था। इसके साथ ही भारत के राष्ट्रपति द्वारा गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार से भी सम्मानित हो चुके थे। कमाल खान खबर को पेश करने के अंदाज को लेकर काफी मशहूर थे और देश भर में उनके अंदाज और रिपोर्टिंग को सराहा जाता था। वह एनडीटीवी से पहले अमृत प्रभात, दैनिक जागरण तथा अन्य समाचार पत्रों में भी कार्य कर चुके थे। मृदुभाषी कमाल खान सभी के चहेते थे।