स्त्रियों को उनका उचित प्राप्य कब देना सीखेगा, हमारा समाज

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प्रो. गीता दूबे

ऐ सखी सुन -9

सभी सखियों को नमस्कार। उम्मीद है सखियों कि आप सभी मजे में होंगी और‌ अपनी जिंदगी को अपने- अपने तरीके से बदलने की पुरजोर कोशिश में लगी होंगी। थोड़ा- थोड़ा ही सही, अगर बदलाव आयेगा तो जिंदगी खुद ब खुद पुरसुकून हो जाएगी। 

प्यारी सखियों, बहुत दिनों से एक बात मन को मथ रही है और‌ आज उस घुटन को आपसे साझा कर रही हूँ। दुख इस बात का है कि जिस स्त्री के लिए यह कहा जाता है कि उसके बिना घर- आँगन सूना -सूना लगता है। जिस घर में स्त्री ना हो वह घर घर नहीं कहलाता। ऐसे घर के लिए कहा जाता है, “बिन घरनी घर भूत का डेरा”। ब्याह करके जब बहू घर आती है तो उल्लास के साथ उत्सव, प्रीतिभोज आदि का आयोजन किया जाता है। लेकिन मुश्किल तो यह है कि बहू का तो हम स्वागत करते हैं, बेटी का नहीं। स्वागत तो दूर की बात है कई बार तो हम उनके जन्म का पथ ही अवरूद्ध कर देते हैं ‌ जरा सोचो तो सखी कि जब बेटियाँ जन्मेंगी ही नहीं तो किसी के घर में बहू बनकर भला कैसे जाएंगी और उस घर को सही मायनों में घर कैसे बनाएंगी। देश के एक बड़े हिस्से में इस कदर‌ बेटियों का अकाल पड़ गया है कि उन्हें अपने बेटों के लिए पत्नियाँ और‌ घर के लिए बहुएँ खरीद कर लानी पड़ती हैं। सखियों, जब तक हम इस दोहरी मानसिकता के घेरे में कैद रहेंगे जिसके तहत नवरात्र के अवसर पर कन्याओं को जिमाएंगे, उनके पैर‌ पूजेंगे लेकिन अगर हमारे घर में कन्याएँ पैदा होंगी तो शोक के सागर में गोते लगाने लगेंगे तब तक देश में लड़की और लड़के के बीच का आंकड़ा असमान ही रहेगा। 

सखियों, हमारे समाज में कन्या और पुत्र के बीच में हमेशा एक‌ विभाजन रेखा खिंची रहती है और इसकी शुरुआत उनके जन्म के अवसर से ही हो जाती हे। जहाँ पुत्र जन्म के अवसर पर उत्सव मनाया जाता है और उल्लास से भरकर घर और‌ मोहल्ले की स्त्रियाँ सोहर गाती हैं, धूमधाम से उनकी छठी और बरही की जाती है वहीं कन्या के जन्म लेने पर‌ मुँह फीका करके लोग कहते हैं कि लक्ष्मी आई है। और पीठ पीछे यह भी कहा जाता है कि डिग्री आई है। उत्सव आयोजन की बात तो छोड़ ही दीजिए और उनके स्वागत में भला सोहर की धुन भी कैसे मुखरित हो। एक बात समझ में नहीं आती सखी कि संतान कन्या हो या पुत्र, जन्मदात्री माँ को तो दोनों को‌ अपनी कोख में वहन करने में, जन्म देने में समान आनंद‌ या वेदना का अहसास होता है लेकिन बच्चे के लिंग का पता चलते ही क्यों कभी स्वयं माता या घरवालों का मुँह सूख जाता है तो कभी खुशियों के कमल खिल जाते हैं। 

सखियों, यह भेदभाव बच्चों के जन्म से शुरू होकर जीवनभर‌ जारी रहता है। लड़के का जन्मदिन धूमधाम से मनाया जाता है लेकिन लड़की के लिए हाथ ही नहीं उठता। और इसी सोच का परिणाम है कि हमारे समाज में प्रसिद्ध पुरूषों की जयंती जिस जोर -शोर और धूमधाम से मनती है, स्त्रियों की नहीं। वे चाहे समाज सेविका हों, राजनीतिज्ञ हों या साहित्यकार। और सखियों, इस तथ्य को पूरा समाज भले ही नकारने की कोशिश करें लेकिन इससे सच्चाई बदल नहीं जाती। इस बात का सबसे बड़ा और ज्वलंत उदाहरण है कि पूरा हिंदी साहित्य इस वर्ष प्रख्यात साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती उल्लासपूर्ण ढंग से मना रहा है। उन पर केंद्रित  न जाने कितने आयोजन हो रहे हैं, पत्रिकाओं के विशेषांक प्रकाशित हो रहे हैं लेकिन हिंदी साहित्य की एक प्रखर लेखिका का भी यह जन्मशताब्दी वर्ष है, यह तथ्य हमारी स्मृति से तकरीबन खारिज ही हो चुका है। अपनी आत्मकथा “पिंजड़े की मैना” के माध्यम से स्त्रियों की पारंपरिक नियति को रेखांकित करनेवाली, उसकी छटपटाहट को शब्दबद्ध करनेवाली और उसे मुक्ति का प्रकाश दिखानेवाली एक सशक्त और प्रभावशाली ‌लेखिका चंद्रकिरण सोनरेक्सा की स्मृति बहुत कम लोगों के मन में बची है। स्त्री दर्पण जैसे मंचों को छोड़ दें तो 19 अक्टूबर 1920 में पेशावर.छावनी में जन्म लेनेवाली और हिंदी साहित्य को अपने महत्वपूर्ण रचनात्मक अवदान से समृद्ध करनेवाली, चंद्रकिरण सौनरेक्सा की जन्मशती न तो किसी को याद है और‌ ना ही उसे लेकर किसी आयोजन की सुगबुगाहट ही सुनाई दे रही है। 

और‌ मेरी प्यारी सखियों, इसके पीछे है हमारे रूढ़िग्रस्त समाज‌ की वही पुरातन सोच कि पुरूष का स्थान स्त्री से ऊपर है और इसीलिए आयोजन के केन्द्र में अधिकांशतः पुरूष ही रहता है स्त्री नहीं। भले ही उस स्त्री का अवदान कितन भी अधिक महत्वपूर्ण क्यों ना हो या कद कितना भी ऊंचा क्यों ना हो, पुरूष के पौरूष की आभा के आगे वह अनायास ही निष्प्रभ हो जाती है। जिस पिछड़े हुए समाज में स्त्री के जन्म पर कोई उल्लास नहीं प्रकट किया जाता, कोई उत्सव आयोजित ‌नहीं होता, उसी समाज के तथाकथित प्रगतिशील और सुशिक्षित लोग भला उसकी जन्मशती पर कोई आयोजन क्यों करेंगे। और आश्चर्य इस बात का है कि इस तरह की घटनाएँ उस दौर या वर्ष में भी घटती हैं जब साहित्य के क्षेत्र में वर्ष 2020 का नोबल पुरस्कार एक महिला अर्थात अमेरिकन कवयित्री लुईस ग्लक को मिलता है।

सखियों, समय आ गया है कि माताओं को स्वयं पुत्री के जन्म पर भी सोहर गाने की परंपरा का सूत्रपात करना होगा और उसे भी आयोजन के केन्द्र में बैठाना होगा, तभी समाज बदलेगा और सोच भी। प्रसिद्ध लेखकों की तर्ज पर‌ लेखिकाओं के लिए भी शताब्दी उत्सवों का आयोजन जोर -शोर से होगा। फिलहाल विदा, सखियों। अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी।

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